अध्यात्म से सियासत की सफर में कुछ का बजा डंका तो कुछ हुये गुम
कुछ ऐसे नाम हैं जो न केवल अध्यात्म की दुनिया में मशहूर रहे, बल्कि राजनीति में भी उनका डंका बज रहा
(छतरपुर) आध्यात्मिक शख्सियतों का राजनीति में पदार्पण भारतीय इतिहास की अनोखी घटना नहीं है। सनातन काल से लेकर वर्तमान समय में आध्यात्मिक गुरु किसी न किसी रूप में राजनीति को प्रभावित करते रहे हैं। देश की आजादी के बाद से ही धर्म कर्म के जरिए लोगों का उत्थान करने वाले आध्यात्मिक गुरुओं ने आम लोगों के लौकिक जरूरतों को पूरा करने का बीड़ा उठाया। ये बात अलग है कि कुछ आध्यात्मिक शख्सियतें राजनीति के अथाह सागर में कहीं विलीन हो गईं, तो वहीं कुछ ऐसे भी हैं जिनका सितारा अध्यात्म से लेकर राजनीति की दुनिया तक बुलंद है।
योगी आदित्यनाथ
5 जून 1972 को उत्तराखण्ड के पौड़ी गढ़वाल जिले में पंचूड़ गांव के गढ़वाली राजपूत परिवार में योगी आदित्यनाथ का जन्म हुआ। 1977 में टिहरी के गजा के स्थानीय स्कूल में पढ़ाई शुरू की और 1987 में यहां से दसवीं की परीक्षा पास की। 1989 में ऋषिकेश के श्री भरत मन्दिर इंटर कॉलेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की। 1990 में ग्रेजुएशन की पढ़ाई करते हुए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े। 1992 में श्रीनगर के हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय से इन्होंने गणित में बीएससी की परीक्षा पास की।
1998 में योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से भाजपा प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़े और जीत गए। तब इनकी उम्र केवल 26 वर्ष थी। वे बारहवीं लोक सभा (1998-99) के सबसे युवा सांसद थे। 1999 में ये गोरखपुर से पुनः सांसद चुने गए। अप्रैल 2002 में इन्होंने हिन्दू युवा वाहिनी बनायी। 2004 में तीसरी बार लोकसभा का चुनाव जीता। 2009 में ये 2 लाख से ज्यादा वोटों से जीतकर लोकसभा पहुंचे। 2014 में पांचवी बार एक बार फिर से दो लाख से ज्यादा वोटों से जीतकर ये सांसद चुने गए।
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत मिला, इसके बाद उत्तर प्रदेश में 12 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए। इसमें योगी आदित्यनाथ से प्रचार कराया गया, लेकिन परिणाम निराशाजनक रहे। 2017 में विधानसभा चुनाव में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने योगी आदित्यनाथ से पूरे राज्य में प्रचार कराया।19 मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश के बीजेपी विधायक दल की बैठक में योगी आदित्यनाथ को विधायक दल का नेता चुनकर मुख्यमंत्री पद सौंपा गया।
उमा भारती
उमा भारती किसी परिचय की मोहताज नहीं। मौजूदा समय में भारत सरकार में जल संसाधन, नदी विकास और गंगा सफाई मंत्री है। वो मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री भी रह चुकी है। उन्हें ग्वालियर की महारानी विजयराजे सिंधिया ने उभारा। साध्वी ऋतम्भरा के साथ उन्होंने राम जन्मभूमि आन्दोलन में प्रमुख भूमिका निभाई। इस दौरान उनका नारा था “श्री रामलला घर आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे”।
वह युवावस्था में ही भारतीय जनता पार्टी से जुड़ गयीं थी। 1984 में सर्वप्रथम लोकसभा चुनाव लड़ा, परन्तु हार गयीं। 1989 के लोकसभा चुनाव में वह खजुराहो संसदीय क्षेत्र से सांसद चुनी गयीं और 1991,1996, 1998 में यह सीट बरक़रार रखी। 1999 में वह भोपाल सीट से सांसद चुनी गयीं। वाजपेयी सरकार में वह मानव संसाधन विकास, पर्यटन, युवा मामले एवं खेल और अंत में कोयला और खदान जैसे विभिन्न राज्य स्तरीय और कैबिनेट स्तर के विभागों में कार्य किया। 2003 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में, उनके नेतृत्व में भाजपा ने तीन-चौथाई बहुमत प्राप्त किया और मुख्यमंत्री बनीं। अगस्त 2004 उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, जब उनके खिलाफ 1994 के हुबली दंगों के सम्बन्ध में गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ।
सतपाल महाराज
उत्तराखंड की सियासत में सतपाल महाराज जाने माने नाम हैं। अध्यात्म की दुनिया में अपनी काबिलियत को लोहा मनवाने के बाद वो सियासत की दुनिया में उतरे। लेकिन सियासत में उनका ठिकाना स्थायी नहीं रहा। कांग्रेस पार्टी के बैनर तले उनकी राजनीतिक सफर लंबे समय तक नहीं चली। वो पंद्रहवी लोकसभा में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते और सांसद बने। कांग्रेस की नीतियों की आलोचना करते हुए उन्होंने पार्टी से किनारा कर लिया और 2014 में भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। मौजूदा समय में वो उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं।
निरंजन ज्योति
निरंजन ज्योति वर्तमान में यूपी के फतेहपुर से भाजपा की सांसद हैं। केंद्र सरकार में वो राज्य मंत्री हैं। राजनीति में आने से पहले जोशीले अंदाज में प्रवचन करती थीं। लेकिन विवादित बयानों के लिए अक्सर वो चर्चा में भी रहती हैं। एक दिसंबर 2014 को एक…
✍️ (पंकज पाराशर)
RPKP INDIA NEWS
छतरपुर
