बड़े कर्जदारों के लिए हजारों करोड़ का ‘हेयरकट’, आम आदमी के लिए कर्ज का बोझ क्यों? भाजपा सरकार बनाए व्यापक ‘ऋण राहत नीति’ : अभिनव बरोलिया

भोपाल। RPKP INDIA NEWS

बड़े उद्योगों और कंपनियों के कर्ज मामलों में बैंकों द्वारा हजारों करोड़ रुपये के ‘हेयरकट’ और ऋण write-off किए जाने के आंकड़े देश की बैंकिंग व्यवस्था और आर्थिक न्याय को लेकर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। एक ओर बड़े कॉरपोरेट कर्जदारों के मामलों में बैंकों को भारी नुकसान स्वीकार करना पड़ता है, वहीं दूसरी ओर किसान, छोटे व्यापारी, नौकरीपेशा और मध्यमवर्गीय परिवार छोटी-सी आर्थिक परेशानी में भी कर्ज की किस्तों और ब्याज के बोझ तले दबते चले जाते हैं।

कांग्रेस नेता अभिनव बरोलिया ने कहा कि केंद्र की भाजपा सरकार को देश की जनता को यह स्पष्ट करना चाहिए कि बड़े कर्जदारों के लिए राहत की व्यवस्था हो सकती है, तो आर्थिक संकट में फंसे आम नागरिकों के लिए व्यापक ‘ऋण राहत नीति’ क्यों नहीं बनाई जा सकती?

बरोलिया ने कहा कि उपलब्ध केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2014-15 से 30 सितंबर 2025 तक Large Industries और Large Services श्रेणी में लगभग ₹9.87 लाख करोड़ के बैंक ऋण write-off किए गए हैं। यह आंकड़ा अपने आप में बताता है कि बड़े ऋण खातों के संकट से निपटने के लिए बैंकिंग व्यवस्था में बड़े स्तर पर प्रावधान और समाधान मौजूद हैं।

उन्होंने कहा कि IBC के तहत सामने आए बड़े मामलों में भी भारी ‘haircut’ के उदाहरण हैं। सितंबर 2024 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कुछ प्रमुख मामलों में—

– Jaiprakash Associates (JAL) — लगभग ₹57,185 करोड़ के दावे, करीब ₹41,842 करोड़ का haircut, यानी लगभग 73.2%।
– KSK Mahanadi Power — लगभग ₹26,095 करोड़ के दावे, करीब ₹10,010 करोड़ का haircut, यानी लगभग 38.4%।
– GVK Gautami Power — लगभग ₹2,760 करोड़ के दावे, करीब ₹2,553 करोड़ का haircut, यानी लगभग 92.5%।

बरोलिया ने कहा कि ‘haircut’ और ‘write-off’ एक ही चीज नहीं हैं, लेकिन दोनों मामलों में जनता के सामने पारदर्शिता बेहद जरूरी है। सरकार और बैंकों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कितनी राशि का दावा था, कितनी राशि वसूल हुई, कितनी राशि छोड़ी गई और इन मामलों में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर वास्तविक वित्तीय प्रभाव कितना पड़ा।

उन्होंने कहा कि सवाल केवल बड़े कर्जदारों को राहत मिलने का नहीं, बल्कि आर्थिक न्याय और समान अवसर का है।

आम आदमी के लिए कर्ज क्यों बन जाता है जिंदगीभर का बोझ?

अभिनव बरोलिया ने कहा कि देश का आम नागरिक महंगाई, बेरोजगारी, आय में कमी और बढ़ते खर्च के बीच कर्ज लेने को मजबूर होता है। किसान फसल खराब होने पर, छोटा व्यापारी कारोबार प्रभावित होने पर और मध्यमवर्गीय परिवार शिक्षा, घर, इलाज या अन्य जरूरी खर्चों के लिए कर्ज लेते हैं।

लेकिन जब आर्थिक संकट आता है तो ब्याज, पेनल्टी और किस्तों का दबाव लगातार बढ़ता जाता है।

उन्होंने कहा कि जिस बैंकिंग व्यवस्था में बड़े कर्जों के समाधान के लिए हजारों करोड़ रुपये का haircut संभव है, उसी व्यवस्था में छोटे कर्जदारों के लिए मानवीय और न्यायसंगत समाधान की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती?

बरोलिया ने कहा कि आर्थिक संकट केवल बैंक खाते की समस्या नहीं है। कर्ज का दबाव परिवारों के मानसिक और सामाजिक जीवन पर भी गंभीर असर डाल सकता है। इसलिए सरकार को ऐसे मामलों को केवल NPA और recovery के आंकड़ों तक सीमित नहीं रखना चाहिए।

कांग्रेस नेता की प्रमुख मांगें

अभिनव बरोलिया ने केंद्र सरकार से मांग की कि—

1. आम नागरिकों, किसानों, छोटे व्यापारियों और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए व्यापक ‘ऋण राहत नीति’ बनाई जाए।
2. गंभीर आर्थिक संकट में फंसे पात्र कर्जदारों के लिए ब्याज में राहत दी जाए।
3. जरूरतमंद परिवारों को आसान और लंबी अवधि की किस्तों का विकल्प दिया जाए।
4. वास्तविक आर्थिक संकट वाले खातों के लिए ऋण पुनर्गठन की व्यवस्था सरल बनाई जाए।
5. पात्र जरूरतमंद वर्गों के लिए परिस्थितियों के अनुसार लक्षित कर्ज राहत/कर्ज माफी की व्यवस्था पर विचार किया जाए।
6. बड़े ऋण खातों में हुए write-off, recovery और haircut का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए।
7. बैंकों द्वारा बड़े कर्जदारों के मामलों में किए गए समझौतों और वसूली की स्थिति में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।
8. छोटे कर्जदारों के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई जाए कि आर्थिक संकट के कारण कोई परिवार लगातार बढ़ते ब्याज और किस्तों के चक्र में न फंसे।

बरोलिया ने कहा कि सरकार को एक ऐसी राष्ट्रीय ऋण राहत नीति बनानी चाहिए, जिसमें कर्जदार की आर्थिक स्थिति, आय, रोजगार, कारोबार, फसल और परिवार की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर समाधान तय किया जाए।

उन्होंने कहा, “बड़े कर्जदारों के लिए बैंकिंग व्यवस्था में समाधान के रास्ते मौजूद हैं, तो आम आदमी के लिए भी होने चाहिए। आर्थिक न्याय का अर्थ यही है कि नियम और राहत केवल ताकतवर लोगों के लिए नहीं, बल्कि उस किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी और मध्यमवर्गीय परिवार के लिए भी हो जो ईमानदारी से अपना कर्ज चुकाने की कोशिश कर रहा है।”

अभिनव बरोलिया ने कहा कि भाजपा सरकार को देश की जनता के सामने जवाब देना चाहिए—अगर बड़े कर्जदारों के हजारों करोड़ के ऋण में राहत और समाधान संभव है, तो आर्थिक संकट में फंसे आम परिवारों के लिए ‘ऋण राहत नीति’ क्यों नहीं?

उन्होंने कहा, “किसी उद्योग या कंपनी का आर्थिक संकट बैंकिंग व्यवस्था के जरिए सुलझाया जा सकता है, तो किसी आम परिवार की आर्थिक मजबूरी को उसकी जिंदगी की सजा क्यों बनाया जाए? सरकार की जिम्मेदारी है कि बैंकिंग व्यवस्था में आर्थिक न्याय और मानवीय संवेदनशीलता दोनों सुनिश्चित हों।”

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