सफलता की कहानी 10 हजार मछलियों से बुना आत्मनिर्भरता का सपना, अब हर फसल में 2.10 लाख की कमाई बायोफ्लॉक तकनीक अपनाकर ग्राम करहिया की रीता श्रीवास्तव ने मत्स्य पालन को बनाया आमदनी का मजबूत जरिया
(कटनी) कभी ग्रामीण जीवन में रोजगार के सीमित विकल्पों के बीच आय के नए साधन तलाशने वाली रीठी तहसील के ग्राम करहिया की श्रीमती रीता श्रीवास्तव ने आधुनिक तकनीक और शासकीय योजना का साथ पाकर अपनी मेहनत को आत्मनिर्भरता की कहानी में बदल दिया है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से मिले सहयोग से स्थापित पॉण्ड बायोफ्लॉक इकाई अब उनके लिए केवल मछली पालन का साधन नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक मजबूती और स्वावलंबन का आधार बन गई है। कलेक्टर श्री आशीष तिवारी ने जन विश्वास अभियान के तहत भ्रमण के दौरान पॉण्ड बायोफ्लॉक इकाई का अवलोकन कर रीता की लगन एवं उद्यमशीलता की सराहना की। रीता श्रीवास्तव ने वर्ष 2025-26 में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत सहायता प्राप्त कर बायोफ्लॉक इकाई स्थापित की।
उन्होंने परंपरागत मत्स्य पालन से आगे बढ़ते हुए आधुनिक बायोफ्लॉक तकनीक को अपनाया, जिसमें सीमित स्थान में वैज्ञानिक प्रबंधन के माध्यम से बेहतर मत्स्य उत्पादन की संभावनाएं रहती हैं। 10 हजार मत्स्य बीज से शुरू हुआ आत्मनिर्भरता का सफररीता श्रीवास्तव की इकाई में लगभग 10 हजार GIFT तिलापिया मत्स्य बीज का संचयन किया गया। मछलियों की बेहतर वृद्धि और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन के लिए उन्हें नियमित रूप से संतुलित एवं गुणवत्तापूर्ण फ्लोटिंग फीड दिया जाता है। जल की गुणवत्ता, ऑक्सीजन स्तर और अन्य आवश्यक मानकों की नियमित निगरानी कर इकाई का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन किया जा रहा है।
मेहनत, तकनीक और निरंतर देखभाल का परिणाम भी शानदार रहा। लगभग 5 से 6 माह की एक फसल अवधि में करीब 5 मीट्रिक टन यानी 5 हजार किलोग्राम मछली का उत्पादन प्राप्त हो रहा है। एक फसल में 2.10 लाख रुपये का शुद्ध लाभ मछलियों के विक्रय से प्राप्त आय में से उत्पादन संबंधी खर्च घटाने के बाद रीता श्रीवास्तव को एक फसल में लगभग 2.10 लाख रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हो रहा है। वर्ष में दो बार मत्स्य फसल लेने पर उनकी वार्षिक शुद्ध आय लगभग 4.20 लाख रुपये तक पहुंचने की संभावना है। यह आमदनी उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के साथ ही यह भरोसा भी दे रही है कि गांव में रहकर आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर भी सम्मानजनक एवं स्थायी स्वरोजगार स्थापित किया जा सकता है। योजना का सहारा, मेहनत ने संवारी सफलतारीता श्रीवास्तव के लिए प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना आत्मनिर्भरता की राह में महत्वपूर्ण सहारा बनी। योजना के अंतर्गत मिले सहयोग से आधुनिक इकाई स्थापित करने का अवसर मिला और उन्होंने इसका उपयोग पूरी लगन एवं वैज्ञानिक तरीके से किया।
गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज, संतुलित आहार, जल गुणवत्ता का बेहतर प्रबंधन और नियमित देखभाल ने उनकी इकाई को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज उनकी इकाई ग्रामीण क्षेत्र में आधुनिक मत्स्य पालन की संभावनाओं को साकार करती दिखाई दे रही है। रीता की सफलता में दिख रहा गांव की महिलाओं के लिए नया रास्तारीता श्रीवास्तव की सफलता की कहानी केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। यह उन ग्रामीण महिलाओं और युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो अपने गांव में रहकर ही स्वरोजगार के नए अवसर तलाश रहे हैं। उन्होंने साबित किया है कि तकनीक के साथ जुड़कर परंपरागत कार्य भी लाभकारी व्यवसाय में बदले जा सकते हैं। सीमित क्षेत्र में बायोफ्लॉक तकनीक के जरिए मत्स्य पालन, बेहतर उत्पादन और अच्छी आय का माध्यम बन सकता है।
