एक पत्रकार – एक पहचान : लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को मिले संवैधानिक सम्मान
कटनी। RPKP INDIA NEWS
आज पत्रकारिता केवल बड़े टीवी चैनलों और राष्ट्रीय अखबारों तक सीमित नहीं है। एक लघु साप्ताहिक अखबार का संपादक, एक पाक्षिक पत्रिका का रिपोर्टर, एक मासिक समाचार पत्र का संवाददाता, एक यूट्यूब चैनल चलाने वाला स्वतंत्र पत्रकार, एक न्यूज पोर्टल का संचालक और सोशल मीडिया पर जन-सरोकार की खबरें लिखने वाला नागरिक पत्रकार – सभी लोकतंत्र को जिंदा रखने में लगे हैं। लेकिन दुर्भाग्य है कि आज माध्यम के आधार पर पत्रकारों में भेदभाव किया जाता है। जरूरत है – “एक पत्रकार – एक पहचान” के सिद्धांत को लागू करने की।
1. माध्यम नहीं, मानक बने पत्रकारिता का आधार
पत्रकारिता करने वाले सभी लोगों को एक ही नजर से देखा जाए। चाहे वह लघु, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक समाचार पत्र हो, सोशल मीडिया न्यूज पोर्टल हो, यूट्यूब न्यूज चैनल हो, छोटे मीडिया हाउस हों या स्वतंत्र (फ्रीलांस) पत्रकार हों – इन सभी को उनके पत्रकारिता के मानक, निरंतरता, जन-सरोकार और नैतिकता के आधार पर पत्रकार का दर्जा दिया जाए, न कि उनके संस्थान के आकार या टर्नओवर के आधार पर। यदि कोई व्यक्ति नियमित रूप से पत्रकारिता के सिद्धांतों का पालन करते हुए खबरों का संकलन, संपादन और प्रकाशन कर रहा है, तो वह पत्रकार है।

2. राष्ट्रीय पत्रकार रजिस्टर और एकीकृत पहचान पत्र
सरकार को एक राष्ट्रीय पत्रकार रजिस्टर (National Register of Journalists) तैयार करना चाहिए। इसमें आधार की तरह प्रत्येक पत्रकार का पंजीकरण हो। प्रत्येक पत्रकार के प्रकाशित समाचार, उसके माध्यम की निरंतरता और प्रेस काउंसिल/स्व-घोषणा के आधार पर एक समिति सत्यापन करे। सत्यापन के बाद केंद्र सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त “राष्ट्रीय पत्रकार पहचान पत्र” जारी किया जाए। यह पहचान पत्र पूरे भारत में मान्य हो, जिससे किसी भी जिले में पत्रकार को अपनी पहचान के लिए भटकना न पड़े।
3. लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को संवैधानिक दर्जा
संविधान में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का स्पष्ट उल्लेख है, लेकिन चौथे स्तंभ प्रेस को अभी तक संवैधानिक सुरक्षा नहीं मिली है। पत्रकारों पर हमले, झूठे मुकदमे और दमन की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसलिए मांग है कि पत्रकारिता को संवैधानिक दर्जा दिया जाए। पत्रकार को खबर लिखने से रोकना, लोकतंत्र की आवाज को दबाने जैसा होगा, जिसे संवैधानिक अपराध की श्रेणी में माना जाए।
4. ऑल इंडिया पत्रकार वेलफेयर बोर्ड और कोष
देश के लाखों छोटे और मझोले पत्रकार आज आर्थिक असुरक्षा में जी रहे हैं। न पेंशन, न बीमा, न दुर्घटना सहायता। राष्ट्रीय स्तर पर ऑल इंडिया पत्रकार वेलफेयर बोर्ड का गठन हो और इसके अंतर्गत राष्ट्रीय पत्रकार कल्याण कोष बनाया जाए।
कोष के स्रोत: केंद्र व राज्य सरकारों का अंशदान, बड़े मीडिया घरानों के विज्ञापन राजस्व का निश्चित प्रतिशत तथा सीएसआर फंड।
उपयोग: दुर्घटना/गंभीर बीमारी/मृत्यु पर सहायता, सेवानिवृत्त पत्रकारों को पेंशन, स्वास्थ्य बीमा, बच्चों की शिक्षा सहायता तथा महिला पत्रकारों के लिए विशेष योजना।
5. ग्राम पंचायत से राष्ट्रीय स्तर तक स्वतंत्र पत्रकार आयोग
राजनीतिक पहुंच से पूरी तरह मुक्त राष्ट्रीय पत्रकार शिकायत एवं समाधान आयोग का गठन किया जाए, जिसकी शाखाएं राज्य, जिला, तहसील और ग्राम पंचायत स्तर तक हों। इसमें सेवानिवृत्त न्यायाधीश, वरिष्ठ पत्रकार और प्रेस संगठनों के प्रतिनिधि हों। आयोग पत्रकारों के उत्पीड़न, विज्ञापन में भेदभाव, अधिमान्यता में पक्षपात और प्रशासनिक उपेक्षा जैसे मामलों का 30 दिनों के भीतर निपटारा करे।
6. सभी संगठनों को जोड़कर राष्ट्रीय पत्रकार काउंसिल
सभी पंजीकृत पत्रकार संगठनों को एक मंच पर लाकर नेशनल काउंसिल ऑफ जर्नलिस्ट्स (NCJ) का गठन किया जाए। यह काउंसिल पत्रकारों के हित में नियम बनाएगी, आचार संहिता तय करेगी, शासन-प्रशासन और पत्रकारों के बीच समन्वय का पुल बनेगी तथा कल्याण योजनाएं तैयार करेगी।
निष्कर्ष:
यह लड़ाई किसी बड़े चैनल की एंकर या बड़े अखबार के संपादक की नहीं है। यह लड़ाई उस आम पत्रकार की है जो पांच हजार के मोबाइल से खबर शूट करता है, साइकिल से कलेक्ट्रेट के चक्कर लगाता है और अपनी जेब से पेट्रोल भरकर किसी गरीब की आवाज को शासन तक पहुंचाता है।
यदि सरकार सच में लोकतंत्र को बचाना चाहती है, तो उसे अपने चौथे स्तंभ को बचाना होगा। एक पहचान, एक सम्मान, एक सुरक्षा – यही आम पत्रकार की मांग है और यही लोकतंत्र की भी जरूरत है।
— हरिशंकर पाराशर
वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक
जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया, मध्य प्रदेश
