जननायक टंट्या भील का जीवन संघर्ष और राष्ट्र प्रेम का प्रेरणा स्रोत है- डॉ. मोहनलाल कोरी

क्रांति सूर्य टंट्या भील विश्वविद्यालय के कुलगुरु श्री मोहनलाल कोरी ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी टंट्या भील के परिवारजनों से की सौजन्य भेंट

(खरगोन) सन 1857 में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी वीरों एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में मध्यप्रदेश के जनजातीय समाज के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी टंट्या भील का नाम बड़े सम्मान एवं आदर के साथ लिया जाता है। क्रांति सूर्य टंट्या भील विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. मोहनलाल कोरी ने जनजातीय समाज के इस महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के परिवारजनों से सौजन्य भेंट की तथा उनके जीवन और संघर्ष के बारे विस्तार से बातचीत की।    टंट्या भील वंशज चौथी पीढ़ी एवं संरक्षक श्री दरियाव सिरसाटे ने बताया कि जननायक क्रांतिकारी टंटया भील का जन्म 4 अप्रैल 1842 का खंडवा जिले में अपने ननिहाल में हुआ था। बाल्यावस्था में माता के निधन हो जाने से उनके पिता श्री भाऊसिंह द्वारा लालन पोषण कर लाठी गोपन व तीर कमान चलाने का प्रशिक्षण दिया गया। लगातार 15 वर्ष तक गुरिल्ला युद्ध करके अंग्रेज शासन को समाप्त करने के लिये परमवीर क्रांतिकारी अजेय योद्धा टंट्या भील ने क्राति की अलख जनमानस में जगाई। निहत्थे क्रातिकारी टंटया भील को छल पूर्वक अंग्रेज शासन ने गिरफ्तार करके जबलपुर जेल भेज दिया। जहां उन पर अमानवीय अत्याचार करके मुकदमा चलाया गया। 04 दिसम्बर 1889 को उन्हें फांसी दे दी गई।

कुलगुरु श्री कोरी ने कहा कि जननायक टंट्या भील के जीवन संघर्ष से प्रेरणा लेकर हम विश्वविद्यालय के माध्यम से उनकी शिक्षाओं को जन-जन तक पहुंचाने का माध्यम बनाएंगे। इस अवसर पर कुल सचिव डॉ. जीएस चौहान, डॉ. राजाराम आर्य, प्रो मनोज भार्वे तथा अन्य गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

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