बाणसागर परियोजना: 46 साल बाद भी विस्थापित न्याय के इंतजार में

(कटनी/बरही) सन् 1978 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री माननीय श्री मोरार जी देसाई की सरकार द्वारा रीवा जिले के देवलौंद में बाणसागर बहुउद्देशीय परियोजना का शिलान्यास किया गया। परियोजना का उद्देश्य तीन नदियों को बांधकर प्रदेश में सिंचाई और विद्युत उत्पादन की सुविधा बढ़ाना था। उस समय हजारों करोड़ों रुपये की लागत से जलाशय निर्माण की योजना लागू की गई।

बांध निर्माण से प्रभावित होने वाले क्षेत्रों में किसानों की जमीन, मकान, बाग-बगीचे, वृक्षों और आजीविका के नुकसान की भरपाई के लिए शासन ने सर्वे कर मुआवजा भुगतान के आदेश जारी किए। साथ ही शासन ने यह भी घोषणा की कि प्रत्येक प्रभावित परिवार के पात्र सदस्य को सरकारी नौकरी और एक आवासीय पट्टा देकर पुनर्वास किया जाएगा।

मुआवजा प्रक्रिया हेतु भू-अर्जन अधिकारी, आरआई एवं पटवारी की टीमों द्वारा गांव-गांव पहुंचकर राजस्व अधिनियम की धारा 4 एवं 9 के तहत जनसुनवाई की गई।
सन् 1991-92 से 2005 तक प्रभावित किसानों को जमीन, घर और पेड़-पौधों का मुआवजा वितरित किया गया। किन्तु 30 जून 2006 को राज्य शासन द्वारा भू-अर्जन कार्य को शून्य घोषित कर दिया गया, जबकि उस समय अनेक गांवों की आपत्तियां अभी लंबित थीं।

कटनी जिले के विजयराघवगढ़ तहसील के आंशिक डूब प्रभावित गांव कोनिया, कुदरी, उबरा, मनघटा, लूली, खेरवा उर्दानी, डीघी आदि में किसानों की भूमि व भवन का मुआवजा 2005-06 तक अधूरा वितरित किया गया एवं बिना आपत्तियों का निराकरण किए भू-अर्जन प्रक्रिया समाप्त कर दी गई।

349 गांव प्रभावित, पर मुआवजा अत्यंत कम
कटनी, सतना एवं शहडोल जिलों के कुल 349 गांव बाणसागर जलभराव क्षेत्र में आए। जमीन की श्रेणी के आधार पर किसानों को 1500 से 2500 रुपये प्रति इकाई के हिसाब से बेहद कम मुआवजा भुगतान किया गया।

किसानों का आरोप है कि मुआवजा वितरण में बिचौलियों और भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से गरीबों का शोषण हुआ राशि बढ़वाने के नाम पर भारी कमीशन वसूला गया और दलालों के माध्यम से चेक जारी किए गए।

सन् 1995-96 में बांध निर्माण पूर्ण हुआ जिसका उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार ने किया।
इसके बाद वर्ष 2010 में बांध के गेट बंद कर पूर्ण जलभराव किया गया, जिससे सैकड़ों गांव स्थाई रूप से डूब क्षेत्र में आ गये और किसानों की संपत्ति पूरी तरह नष्ट हो गई।

आज भी हजारों किसान राहत की प्रतीक्षा में
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि आज भी अनेक गांवों के प्रभावित परिवारों का मुआवजा भुगतान लंबित है। न तो घोषित नौकरी मिली और न ही सभी को आवासीय पुनर्वास पट्टा प्रदान किया गया।

पप्पू तिवारी बने आंदोलन की आवाज
विजयराघवगढ़ विधानसभा क्षेत्र के ग्राम लूली के समाजसेवी एवं मजदूर नेता श्री चंद्र प्रताप (पप्पू) तिवारी, वर्षों से प्रभावितों को न्याय दिलाने के लिए संघर्षरत हैं।
उन्होंने बाणसागर परियोजना अधिकारियों और शासन प्रशासन को अनेक बार पत्र, आवेदन, कैम्प और जनसुनवाई की मांग दर्ज कराई, किंतु अभी तक संपूर्ण राहत नहीं मिल पाई।

उनके निरंतर संघर्ष के परिणामस्वरूप 2021-22 में लूली, खेरवा, डीघी, मनघटा, कुदरी, कोटेश्वर और उबरा गांव में कुछ किसानों को आंशिक मुआवजा दिया गया।
लेकिन पप्पू तिवारी का कहना है।
“जब तक क्षेत्र के प्रत्येक प्रभावित को पूरा मुआवजा, नौकरी और पुनर्वास का हक नहीं मिल जाता तब तक हमारा संघर्ष जारी रहेगा।”

वे आरोप लगाते हैं कि
न तो क्षेत्रीय विधायक आते हैं और न ही कोई जनप्रतिनिधि। विपक्ष भी चुप रहता है। चुनाव के समय वोट मांगने के अलावा कोई हमारी पीड़ा सुनने नहीं आता यह बहुत गंभीर स्थिति है।

✍️ सुरेन्द्र दुबे, पत्रकार
         विजयराघवगढ़

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