भारतीय साहित्य में महिला लेखकों का अहम योगदानः लेखिका प्रिया मेश्राम
(मुंबई) महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल और नक्सल प्रभावित क्षेत्र गडचिरोली से निकलकर शिक्षा और साहित्य की दुनिया में अपनी पहचान बनाना आसान नहीं होता। सीमित संसाधन, सामाजिक बाधाएं और अवसरों की कमी इन सबके बीच जो आगे बढ़ता है, उसकी कहानी केवल सफलता की नहीं, बल्कि संघर्ष, जिद और आत्मविश्वास की मिसाल बन जाती है।
ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है लेखिका प्रिया मेश्राम की।
14 अप्रैल 1985 को गडचिरोली में जन्मीं प्रिया मेश्राम ने उस परिवेश में शिक्षा हासिल की, जहां आज भी उच्च शिक्षा तक पहुंचना एक बड़ी चुनौती माना जाता है। एक आदिवासी क्षेत्र से निकलकर एम.ए. (मनोविज्ञान), बी.ई. और एम.टेक (कंप्यूटर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग) जैसी उच्च डिग्रियां प्राप्त करना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।
लेकिन उनका सफर केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहा।
समाज में महिलाओं पर पारंपरिक जिम्मेदारियों का बोझ अक्सर पुरुषों से अधिक होता है.घर, परिवार, सामाजिक अपेक्षाएं इन सबके बीच अपने सपनों को जिंदा रखना और उन्हें आकार देना आसान नहीं होता। खासकर लेखन जैसे संवेदनशील और समय मांगने वाले क्षेत्र में आगे बढ़ना, एक महिला के लिए कई बार और भी कठिन हो जाता है।
प्रिया ने इन सभी चुनौतियों का सामना किया और अपनी लेखनी को कभी थमने नहीं दिया।
बचपन से ही लिखने की रुचि रखने वाली प्रिया ने कविताओं से अपनी साहित्यिक यात्रा शुरू की और धीरे-धीरे ग़ज़ल, कहानियों व अन्य विधाओं में भी अपनी पहचान बनाई। उनकी लेखनी में संघर्ष की सच्चाई, भावनाओं की गहराई और समाज को बदलने की ताकत दिखाई देती है।
उनकी कृति “मन में ताला” (कविता संग्रह) को विशेष सराहना मिली और इसके लिए उन्हें नागपुर साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित किया गया। उनकी आगामी पुस्तक “ती तिसरी सावली” (2026) भी जल्द ही प्रकाशित होने वाली है, जिससे पाठकों को नई सोच और संवेदनाओं से रूबरू होने का अवसर मिलेगा।
प्रिया का मानना है कि आज महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, लेकिन उनकी असली ताकत उनके संघर्ष में छिपी होती है। उन्होंने अपनी कविताओं और कहानियों के माध्यम से महिलाओं की अनकही भावनाओं, उनके दर्द और उनकी शक्ति को शब्द देने का प्रयास किया है।
उन्हें विभिन्न मंचों पर सम्मानित किया जा चुका है, चेन्नई में आयोजित ऑथर्स पेज अवार्ड 2010 में ‘तरुण्याचे पाहिले पाहुल’ को बाल एवं युवा वयस्क पुस्तक पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
जिनमें “सावित्रीच्या लेकी” राज्यस्तरीय पुरस्कार (2022), काई .वीर लक्ष्मण अन्नाजी राणे पितृभूषण पुरस्कार 2020, स्टार – एफएसआईए द्वारा महिला उद्यमियों की श्रेणी में रियल सुपर वुमन 2020 का पुरस्कार प्राप्त किया। “जागतिक महिला दिन – उद्योजिका सन्मान 2025” जैसे प्रतिष्ठित सम्मान शामिल हैं।
। साथ ही उनकी पुस्तक मन में ताला के लिए नागपुर साहित्य अकादमी ने उन्हें श्रेष्ठ जीएनआईटी नागपुर, महिला विकास – विशिष्ट अतिथि धुक्यातील वाट प्रकाशन सोहळा – प्रकाशक , इंडियन स्टुडंट कौन्सिल -सावित्रीच्या लेकी राज्यस्तरीय पुरस्कार 2022, जागतिक आंबेरडकरवादी साहित्य महामंडळ ,तिसरे राज्यस्तरीय बौद्ध साहित्य संमेलन जळगावं कवी संमेलन पुरस्कार का सम्मान भी दिया।
पुस्तक का शीर्षक लेखक & लेखानी पब्लिकेशन्स के प्रकाशक, परामर्शदाता, लेखक, कवि प्रिया मेश्राम , महिलाओं की अनकही भावनाएँ- प्रिया मेश्राम , मन में ताला (कविता संग्रह)- प्रिया मेश्राम , सूर्यप्रतिमा – डॉ. प्रकाश राठौड़ कोरोनायन – डॉ. मनोहर नाइक , सूर्यपालवी – डॉ. यशवन्त मनोहर , नक्षत्राची वेल – डॉ. यशवन्त मनोहर , शिवराय से भीमराव – इंजी. (वकील) प्रणय सोहमप्रभा , सगाई के नियम – रंजनीश . वीज़ा की प्रतीक्षा – इंजी. (अधिवक्ता) प्रणय सोहमप्रभा . मौर्य वंश – डी. सोमकुवर सो. लोकतंत्र नष्ट हो जायेगा – इंजी. (वकील) प्रणय सोहमप्रभा . क्या भोर बंजारा -डॉ. समकालीन भारत में प्रकाश राठौड़ समाज का राजनीतिक अस्तित्व -डॉ. सरजंदित्य मनोहर हाल्वे गुंजन – संगीता नागदेवे ये कट्टरपंथी लोग किस तरह के भारतीय हैं – डॉ. सर्जनादित्य मनोहर- हरित क्रांति का सूर्योदय-डॉ. प्रकाश राठौड़ युद्ध संहिता-डॉ. मनोहर नाइक क्रांति की भूमि-विट्ठलवलसे पाटिल धम्मक्रांति और वास्तविकता-डॉ. प्रकाश राठौड़ संवैधानिक संस्कृति भारतीय समाज-डॉ. प्रकाश राठौड़ क्रांतिकारी संस्कृति की योजना परिवर्तन की संवैधानिक दिशा-डॉ. अनमोल शेंडे विचार मंथन-डॉ. अनमोल शेंडे,बहुजन एकता के सूत्र-डॉ. सर्जनादित्य मनोहर , धुंध में पथ-शालिनी भास्कर नाइक मुक्त खानाबदोशों का क्रांतिकारी संविधान-डॉ. प्रकाश राठौड़ । गडचिरोली जैसे क्षेत्र से निकलकर साहित्य, शिक्षा और समाज में अपनी पहचान बनाना यह दर्शाता है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी परिस्थिति इंसान को आगे बढ़ने से रोक नहीं सकती। हमेशा लडकियों को सिर्फ चुल्हा चौका देखना यही संस्कार दिये जाते है| उसको कमजोर बनाया जाता है परंपरा का नाम देके. सारे बंधन को तोडके खुद के लिये लढना मुश्किल होता है. बहोत कुछ छुटजाता है, अपने साथ छोड देते है. सरकारी नोकरीं सबसे बेहतर कमाने का जरिया समझा जाये वहा तुम्हारे संपनो की किंमत नहीं होती. वहा संपनो के साथ समाज के हित के लिये लढना और मुश्किल है।
प्रिया आज सिर्फ एक लेखिका नहीं, बल्कि उन हजारों लड़कियों के लिए प्रेरणा हैं, जो सीमित परिस्थितियों में भी बड़े सपने देखने का साहस रखती हैं।
✍️ संजीव भागीरथी पांडे
महाराष्ट्र प्रमुख
RPKP INDIA NEWS
