कागजों में सुशासन, जमीन पर हकीकत बेहाल!: कलेक्टर और एसपी बिना बताए गांव पहुंचें तो खुलेंगी प्रशासनिक दावों की परतें, मध्यान्ह भोजन से लेकर अवैध शराब तक उठे सवाल
कैमोर। RPKP INDIA NEWS
जिले में प्रशासन के सुशासन और सख्त कार्रवाई के दावों के बीच जमीनी हकीकत को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आम लोगों का कहना है कि यदि प्रशासनिक अधिकारी वास्तव में व्यवस्थाओं की सच्चाई जानना चाहते हैं, तो उन्हें पूर्व सूचना और पूरे सरकारी अमले के साथ निरीक्षण करने के बजाय अचानक गांवों में पहुंचकर वास्तविक स्थिति देखनी चाहिए।
मध्यान्ह भोजन व्यवस्था को लेकर सवाल उठाते हुए लोगों का कहना है कि कलेक्टर महोदय को एक दिन बिना स्टाफ को बताए किसी गांव में पहुंचकर बच्चों के साथ मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता स्वयं जांचनी चाहिए। तब ही वास्तविक स्थिति सामने आएगी कि बच्चों को परोसा जा रहा भोजन वास्तव में खाने योग्य और गुणवत्तापूर्ण है या महज कागजी रिपोर्टों में सब कुछ दुरुस्त दिखाया जा रहा है।
इसी तरह अवैध शराब की कथित पैकारी को लेकर भी ग्रामीण क्षेत्रों में चर्चा है। लोगों का कहना है कि यदि पुलिस प्रशासन इसकी वास्तविकता जानना चाहता है तो एसपी महोदय को भी किसी शाम बिना पूर्व सूचना के किसी गांव का दौरा कर स्थानीय लोगों से सीधे जानकारी लेनी चाहिए। इससे यह पता चल सकेगा कि अवैध शराब की बिक्री को लेकर किए जा रहे दावों और जमीनी हकीकत में कितना अंतर है।
क्या सिर्फ निरीक्षण और कागजी कार्रवाई से चलेगा सुशासन?
लोगों का आरोप है कि कई बार अधिकारियों के निर्धारित कार्यक्रमों के दौरान व्यवस्था को पहले से दुरुस्त कर दिया जाता है, जिससे निरीक्षण के दौरान सब कुछ सामान्य नजर आता है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या अचानक और बिना सूचना के निरीक्षण ही प्रशासन की वास्तविक कार्यप्रणाली की परीक्षा नहीं होनी चाहिए? ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासनिक अधिकारी वातानुकूलित कार्यालयों और पूर्व निर्धारित निरीक्षणों से बाहर निकलकर अचानक गांवों में पहुंचें, आम लोगों से सीधे संवाद करें और मौके पर व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति परखें।
जनता का सीधा सवाल है कि अगर व्यवस्था वास्तव में इतनी ही बेहतर है, तो फिर अचानक निरीक्षण से डर कैसा?
अब देखना यह है कि प्रशासन इन सवालों को गंभीरता से लेते हुए जमीनी स्तर पर औचक निरीक्षण करता है या फिर सुशासन के दावे केवल कागजी कार्रवाई तक ही सीमित रहते हैं।

