हमारी साफ और स्वच्छ नदियां हो रही मैली, इसलिए स्वच्छता अभियान जरूरी

स्वच्छता के स्वभाव और संस्कार व्यवहार में आये तो जलस्रोतों से मिलेगा जीवन भर स्वच्छ पानी

(बालाघाट) नदियां जीवनदायिनी हैं, इन्हें संस्कारों की जननी यूं ही नहीं कहा जाता है। प्रकृति के सौंदर्य को नदियों ने निखारने के साथ ही नदियों ने धर्म अध्यात्म को अपनी गोद में बसाया है। आज भले कितने ही आधुनिक और साक्षर होने का दावा क्यों न करें लेकिन जिन नदियों ने हमारे जीवन को संवारा है, हम उनके अस्तित्व को बचाने में चूक कर रहे हैं। मानवीय प्रयासों में चूक का ही नतीजा है कि हमारी कई नदियां अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। उनके प्रति सरकार चिंता जता रही हैं, मृत प्राय नदियों के पुनर्जीवन की योजना पर काम किया जा रहा है। निश्चित ही बदलाव के साथ विकृति पनपी है, लोग नदियों में कचरा डाल इन्हें गंदा कर रहे है। नदियों के प्रति हमारी लापरवाही इनका अस्तित्व खत्म कर रही है। यदि आज भी नदियों और जलस्रोतों के प्रति हमारे स्वभाव और संस्कार नहीं बदले तो धीरे-धीरे झरने, तालाब और सैकड़ो जल संरचनाएं प्रकृति अपने में समाहित कर लेगी। आज जिस तरह नदियां मैली हो रही है। इसलिए स्वच्छता अभियान जरूरी है। स्वच्छता के प्रति हमारे स्वभाव बदलने होंगे, नदियों और जल से जुड़े संस्कारों की ओर लौटना पड़ेगा। यही स्वच्छता सेवा अभियान का उद्देश्य भी है। 22 सितंबर को विश्व नदी दिवस है, यह उन नदियों के लिए आम जन में जागरूकता लाने का अवसर है, जिन्हें लेकर हमें चिंतन करने की जरूरत है। विषय गंभीर है,पर कोई भी प्रयास कभी असफल नहीं हुए। जिले की नदियों को संवारने जन जागरूकता के साथ लोग काम करेंगे तो हमारी आने वाली पीढ़ियों को जल संकट की त्रासदी का मुंह नहीं देखना पड़ेगा।                                                            बालाघाट में नदियां और झरने

बालाघाट संसाधनों की भूमि के नाम से भी जाना जाता है। ये संसाधन हमें वेनगंगा, घिसर्री और देव नदियों के द्वारा हम तक पहुँच रहें है। नदियों में मुख्य रूप से वेनगंगा नदी आज प्रदेश की सबसे साफ और स्वच्छ नदी के रूप में जानी जाती है। इसका एक कारण है, इस नदी पर कोई भी उद्योग या फैक्ट्री स्थापित नहीं है। इसलिए साफ और स्वच्छ भी है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि वेनगंगा का स्वरूप बनाये रखें। गांगुलपारा, रमरमा, गोदरी और सतनारी जैसे जल प्रपात बालाघाट के सुंदर और मनोरम स्थल है। इन पर गंदगी और कचरा फैलाने से बचाने की जिम्मेदारी सैलानियों को भी करनी चाहिए। ताकि आने वाली पीढ़ी को हम साफ स्वच्छ और प्राकृतिक स्थल दे पाए। आज कई पर्यटक झरनों व नदियों में बिना सोचे कचरा उड़ेलने का काम कर जाते हैं। साथ ही ऐसे स्थलों पर अपनी निशानी के तौर पर अनावश्यक पेंटिंग जैसी गलतियां कर आते है। इससे उनका सौंदर्य बिगड़ रहा है।

             क्या कहते है विशेषज्ञ

वेनगंगा नदी पर कोई फैक्ट्रियां नहीं है लेकिन मनुष्य से भी प्रदूषण फैल रहा है। इस प्रदूषण के फैलने से नदियोँ में तत्वों की कमी होगी। इस पर युवा पीढ़ी और पर्यटन स्थलों पर जाने वाले सैलानियों को जागरूक होना होगा। पानी की गुणवत्ता बनाने के लिए प्रदूषण से मुक्त रखना होगा। भूगर्भ शास्त्री डॉ. संतोष सक्सेना

 

 

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