मुर्गी पालन कर आत्म निर्भर हुई अनुसूचित जनजाति वर्ग की महिलायें

कटनी  अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के परिवारों के उत्थान और उनके कल्याण की दिशा में राज्य सरकार अपनी विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से सतत् प्रयासरत है और दृढ़संकल्पित भी है।

            कटनी जिले में अनुसूचित जनजाति वर्ग के बाहुल्य वाले ब्लॉक ढीमरखेड़ा में वन प्रांतर क्षेत्र से जुड़े गांवों की अनुसूचित जनजाति महिलाओं को स्वसहायता समूहों के माध्यम से आत्म निर्भर बनाया जा रहा है। ढीमरखेड़ा विकासखण्ड के कोकोडबरा, भलवारा, देहरी, झिर्री, कोठी के ग्राम उचेहरा, आमझाल, भदनपुर भद्दी आदि ग्रामों की आदिवासी महिलाओं को आत्म निर्भर बनाने और आर्थिक सक्षमता के लिये मुर्गी पालन के लिये समझाईश दी गई। समूहों के माध्यम से महिलाओं ने आगे आकर मुर्गी पालन का व्यवसाय अपनाया और अच्छी आमदनी प्राप्त कर आत्मनिर्भर भी हुई हैं।

            महात्मा गांधी नरेगा स्कीम और एनआरएलएम के संयोजन से इन महिला हितग्राहियों को 1 लाख 40 हजार रुपये लागत के पोल्ट्री फॉर्म शेड बनाकर दिये गये हैं। चूजे एवं मुर्गी दाना आवश्यक देखरेख के लिये दवाईयां उपलब्ध कराने कटनी वूमेंस समूह गठित किया गया है। यह समूह हितग्राहियों को आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने के अलावा तैयार माल के विक्रय की जिम्मेदारी भी उठा रहा है। महिला समूहों के लिये पोल्ट्री फॉर्म संचालन में अपनी भूमिका निभा रहे उपयंत्री सुशील साहू बताते हैं कि आदिवासी गांवों की महिलाओं को घर में ही रोजगार देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने पायलट प्रोजेक्ट के रुप में यह कार्ययोजना क्रियान्वित की गई है। जिसके अच्छे परिणाम मिले हैं। अभी फिलहाल कोकोडबरा, भलवारा, उचेहरा, झिर्री, देहरी, आमाझाल के भदनपुर भद्दी कोठी की लगभग 200 महिलायें मुर्गी पालन का व्यवसाय संचालित कर रही हैं। फिलहाल 60 पोल्ट्री फॉर्म शेड के निर्माण का कार्य जारी है। पोल्ट्री फॉर्म के संचालन और उससे होने वाली आय से इन महिलाओं के जीवनस्तर में काफी सुधार हुआ है। रोजगार से होने वाली आय के दृष्टिगत आस-पास के ग्रामों की महिलायें भी मुर्गी पालन के व्यवसाय की ओर प्रेरित हो रही हैं।

2477 आदिवासी परिवारों को मिला वनभूमि पर काबिज होने का हक

जन्म जन्मांतर से वनभूमि और जंगलों की वनोपज पर आश्रित रहे अनुसूचित जनजाति और विशेष जनजातीय लोगों के लिये अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत अधिकारों की मान्यता अधिनियम 2006 एवं नियम 2008 तो जैसे इन परिवारों के लिये खुशहाली और उन्नति का अधिकार पूर्ण पैगाम लेकर आया। वन प्रांतर में निवास करने वाले और वनोपज की आजीविका पर निर्भर आदिवासी परिवारों को अब अपने घर और आजीविका के नष्ट होने का बिल्कुल भी डर नहीं रहा है। सरकार ने उनके काबिज भूमि का बकायदे अधिकार पत्र सौंपकर उन्हें वनभूमि पर रहने और आजीविका चलाने का हक प्रदान किया है। कटनी जिले में अब तक 2152 अनुसूचित जनजाति एवं परम्परागत वन निवासी परिवारों को व्यक्तिगत दावों के आधार पर तथा 325 स्थलों के अधिकार पत्र सामूहिक दावों के आधार पर कुल 2477 आदिवासी परिवारों को वन भूमि का काबिज होने पर हक प्रदान किया गया है।

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