‘आत्मबल’ और ‘दृढ़-निश्चय’ से असम्भव को भी ‘सम्भव’ किया जा सकता है
मनुष्य को पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठानों से जीवन को नियमित, व्यवस्थित तथा संयमित करने के लिए करते रहना चाहिए, न कि किसी चमत्कार के लिए।
धर्मग्रन्थों की कथाओं पर अगर ध्यान दिया जाए तो इस तरह की भ्रांति नहीं होगी। जप-तप से मन में बैठी नकारात्मकता दूर होती है, आत्मबल मजबूत होता है।
यदि सच कहा जाए तो आत्मबल ही “भगवान ” हैं। आत्मबल सत्य-आचरण से ही संभव है जबकि गलत आचरण/कर्म से भय उत्पन्न होता है। भय व्यक्ति को इतना कमजोर बना देता है कि वह हमेशा संशय तथा उलझन में रहता है। इस स्थिति में मष्तिष्क डवांडोल हालत में रहता है। फिर कोई काम सुचार रूप से नहीं हो पाता है।यहां तक पूजा-पाठ भी बेमन से होता है।जीवनचर्या बाधित होती है।
‘आत्मबल’ और ‘दृढ़-निश्चय’ से असम्भव को भी ‘सम्भव’ किया जा सकता है,क्योंकि आत्मबल,और साहस से ही ‘अवसर’ की पहचान होती है।
इसलिए अपने निर्णय पर हम जितना अधिक ‘विश्वास’ करेंगे, उसी अनुपात में हमें ‘सफलता’ प्राप्त होगी।
✍️ पंडित सुरेन्द्र दुबे
पत्रकार, विजयराघवगढ़
