सफलता की कहानी, कलेक्टर के संवेदनशील हस्तक्षेप से वृद्ध पिता को मिला सम्मान और सहारा
80 वर्षीय चंद्रभान साहू के भरण-पोषण की जिम्मेदारी पुत्रों को सौंपने का आदेश, परिवार में फिर लौटी अपनत्व की भावना
वृद्धजन की समस्या सुनते ही कलेक्टर विकास मिश्रा ने मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए। उनके निर्देशन में उपखंड अधिकारी (राजस्व) विकास आनंद द्वारा माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत प्रकरण दर्ज कर सुनवाई की गई।
जांच और सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि चंद्रभान साहू ने अपने जीवनकाल में ही अपनी चल एवं अचल संपत्तियों का बंटवारा पुत्रों के बीच कर दिया था। इसके बावजूद उनके भरण-पोषण और देखभाल की समुचित व्यवस्था नहीं हो पा रही थी। प्रशासन द्वारा मामले का गंभीरता से परीक्षण कर सभी पक्षों को सुनने के बाद न्यायोचित निर्णय लिया गया।
न्यायालय ने आदेश पारित करते हुए चंद्रभान साहू के सभी पुत्रों को अपने पिता के भरण-पोषण के लिए प्रत्येक माह एक-एक हजार रुपये प्रदान करने के निर्देश दिए हैं। यह राशि प्रत्येक माह की 1 से 5 तारीख के मध्य अनिवार्य रूप से दी जाएगी, जिससे वृद्धजन की भोजन, दवा एवं अन्य आवश्यक जरूरतों की पूर्ति सुनिश्चित हो सके।
सुनवाई के दौरान एक सकारात्मक पहलू यह भी सामने आया कि परिवार के सदस्यों के बीच सहमति बनी और चंद्रभान साहू अपने बड़े पुत्र के साथ पैतृक घर में रहने के लिए तैयार हुए। सभी पुत्रों ने उनकी देखभाल, भोजन एवं आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया। इससे न केवल वृद्धजन को आर्थिक संबल मिला, बल्कि परिवार में पुनः संवाद, जिम्मेदारी और अपनत्व का वातावरण भी निर्मित हुआ।
न्यायालय ने आदेश दिया है कि भुगतान की नियमित निगरानी की जाएगी तथा इसकी पुष्टि के लिए संबंधित राजस्व अमले द्वारा प्रतिमाह प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जाएगा। आदेश का उल्लंघन होने पर भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 24 एवं 25 के तहत वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।
यह प्रकरण इस बात का सशक्त संदेश है कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं है। प्रशासन उनके अधिकारों, सम्मान और गरिमापूर्ण जीवन की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। कलेक्टर श्री विकास मिश्रा के संवेदनशील हस्तक्षेप से न केवल एक वृद्धजन को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का सहारा मिला, बल्कि परिवार को भी अपने दायित्वों का एहसास हुआ। यह पहल समाज में बुजुर्गों के प्रति सम्मान, संवेदनशीलता और पारिवारिक उत्तरदायित्व का प्रेरणादायक उदाहरण बनकर सामने आई है।
