खाद और डीजल संकट को लेकर कांग्रेस का मोहन सरकार पर तीखा हमला, जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री को लिखा खुला पत्र

भोपाल। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष श्री जीतू पटवारी ने प्रदेश में उत्पन्न खाद एवं डीजल संकट को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को खुला पत्र लिखते हुए कहा है कि मध्य प्रदेश का किसान मानसून के स्वागत की तैयारी खेतों में नहीं, बल्कि खाद की कतारों में खड़े होकर कर रहा है। खरीफ सीजन शुरू हो चुका है, बादल प्रदेश पर मेहरबान होने के करीब हैं, धरती भी बुवाई के लिए तैयार है, लेकिन सरकार इस वर्ष भी किसानों की परेशानियां बढ़ाने का काम कर रही है।

श्री पटवारी ने कहा कि यह संकट किसी एक-दो जिले या अंचल तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश का किसान पूछ रहा है कि आखिर मोहन सरकार कौन चला रहा है—कृषि विभाग, सरकार का विज्ञापन विभाग या फिर अव्यवस्था का कोई अदृश्य सरकारी तंत्र। किसानों को किसी भी स्तर पर राहत नहीं मिल पा रही है।

उन्होंने कहा कि मालवा क्षेत्र के उज्जैन, देवास, शाजापुर, आगर-मालवा और रतलाम में किसान डीएपी एवं यूरिया के लिए भटक रहे हैं। सहकारी समितियों के बाहर लंबी कतारें लगी हैं और निर्धारित मात्रा से कम खाद दिए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। कभी अन्न उत्पादन के लिए पहचाने जाने वाला मालवा आज खाद की लाइनों से पहचाना जा रहा है।

निमाड़ के खरगोन, बड़वानी, खंडवा और बुरहानपुर में किसान कपास एवं सोयाबीन की तैयारी छोड़कर डीजल और खाद की तलाश में लगे हुए हैं। खेत तैयार हैं, किसान तैयार हैं, मौसम तैयार है, लेकिन सरकार तैयार नहीं है।

उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड के सागर, दमोह, छतरपुर, टीकमगढ़ और पन्ना के किसान इस चिंता में हैं कि कहीं खाद के इंतजार में बुवाई का समय ही न निकल जाए। पहले किसान मौसम की मार से लड़ता था, लेकिन अब उसे सरकार की अव्यवस्था से भी जूझना पड़ रहा है।

महाकौशल के जबलपुर, नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा, सिवनी और मंडला में भी किसानों द्वारा मांग के अनुरूप खाद नहीं मिलने की शिकायतें सामने आ रही हैं। धान और सोयाबीन उत्पादक क्षेत्र होने के बावजूद पर्याप्त व्यवस्था नहीं होना सरकार की सबसे बड़ी विफलता का प्रमाण है।

ग्वालियर-चंबल के मुरैना, भिंड, दतिया, शिवपुरी और ग्वालियर के किसान घंटों कतारों में खड़े रहने को मजबूर हैं। सरकार के दावों और किसानों की वास्तविकता के बीच की दूरी अब किलोमीटर में नहीं, बल्कि विश्वास के संकट में मापी जा रही है।

नर्मदापुरम-भोपाल संभाग के हरदा, नर्मदापुरम, सीहोर, रायसेन और विदिशा के किसान डीजल और खाद दोनों की उपलब्धता को लेकर परेशान हैं। प्रदेश की महत्वपूर्ण सोयाबीन बेल्ट आज असुरक्षा और अनिश्चितता के बीच खड़ी है। इसके बावजूद पूरी भाजपा लोकतंत्र लूटने में व्यस्त है।

श्री पटवारी ने कहा कि यह संकट किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं है। खरीफ सीजन हर वर्ष आता है, खाद की मांग का अनुमान हर वर्ष लगाया जाता है और डीजल की खपत का आंकलन भी हर वर्ष होता है। इसके बावजूद यदि पूरे प्रदेश से एक जैसी शिकायतें सामने आ रही हैं तो यह सरकार की प्राथमिकताओं का आईना है।

उन्होंने कहा कि आज किसान के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि बारिश कितनी होगी, बल्कि यह है कि खाद मिलेगी या नहीं, मिलेगी तो कितनी मिलेगी और इस बार खाद लेने के लिए उसे कितना संघर्ष करना पड़ेगा।

श्री पटवारी ने आरोप लगाया कि प्रदेश के विभिन्न जिलों से वितरण व्यवस्था पर बिचौलियों और प्रभावशाली नेटवर्क के दबाव की शिकायतें सामने आ रही हैं। भाजपा द्वारा संरक्षित खाद माफिया की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। यदि सरकार इन दावों को गलत मानती है तो उसे जिलावार खाद भंडारण, आवंटन और वितरण का पूरा आंकड़ा सार्वजनिक करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सरकार के पास आयोजन के लिए संसाधन, विज्ञापनों के लिए बजट और आत्मप्रशंसा के लिए समय है, लेकिन खाद वितरण की व्यवस्था के लिए जवाब नहीं है। यदि किसानों का आक्रोश रोज जनसंपर्क विभाग के माध्यम से सरकार तक पहुंच रहा है तो उसे प्रचार का सरकारी व्यापार बंद कर किसानों की चिंता करनी चाहिए।

श्री पटवारी ने कहा कि मध्य प्रदेश का राजनीतिक इतिहास गवाह है कि किसान मौसम की मार झेल सकता है, लेकिन सरकारी लापरवाही को कभी माफ नहीं करता। प्रदेश का जागरूक किसान भी सरकार की विफलताओं की सूची तैयार कर रहा है और आने वाले समय में इसका जवाब देगा।

कांग्रेस की प्रमुख मांगें:
* प्रदेश में खाद और डीजल संकट पर तत्काल विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया जाए।
* जिलावार खाद स्टॉक और वितरण की दैनिक रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
* सभी संभागों में किसानों के लिए आपातकालीन नियंत्रण कक्ष स्थापित किए जाएं।
* खाद की कालाबाजारी और कृत्रिम कमी पैदा करने वालों के विरुद्ध विशेष अभियान चलाया जाए।
* मुख्यमंत्री स्वयं मालवा, निमाड़, बुंदेलखंड, महाकौशल और ग्वालियर-चंबल के किसानों से संवाद कर वास्तविक स्थिति प्रदेश के सामने रखें।

अंत में श्री पटवारी ने कहा कि सरकार की प्रेस विज्ञप्तियों में किसान समृद्ध दिखाई दे सकता है, लेकिन जमीन की सच्चाई यह है कि खेत की मेड़ पर खड़ा किसान आज स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। खाद केंद्रों की कतारें, खाली हाथ लौटते किसान और बढ़ती खेती लागत सरकार के कृषि विकास मॉडल के दावों पर बड़ा प्रश्नचिह्न हैं।

उन्होंने कहा कि यह दुख और शर्म का विषय है कि जिस प्रदेश से देश के कृषि मंत्री आते हैं, उसी प्रदेश का किसान खाद जैसी मूलभूत आवश्यकता के लिए संघर्ष कर रहा है। क्या कागजी “किसान पुत्र” शिवराज जी ने भी मध्य प्रदेश से मुंह मोड़ लिया है।

बहरहाल, मध्य प्रदेश का किसान इंतजार कर रहा है—खाद का भी और लाज खो चुकी सरकारी जवाबदेही का भी।

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