क्या कॉर्पोरेट हॉस्पिटल में इलाज तभी तक होता है,जब तक मरीज “पर्स लेस” और “पल्स लेस” न हो जाए ?
अपने कटनी में तो अभी उतना नहीं,लेकिन देश के बड़े शहरो मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद, बैंगरू,
इंदौर के बाद अब जबलपुर में भी हॉस्पिटलों में “कॉर्पोरेट कल्चर” ने पैर पसारना शुरू कर दिया है।
ये कॉर्पोरेट कल्चर क्या है …?
जहाँ शराब कारोबारी, रेत कारोबारी, बिल्डर्स, खनिज माफिया और राजनीतिक पहुँच वाला अकूत दौलत का मालिक जिसे डॉक्टर का D भी नहीं आता वो भी ग्रुप बनाकर 5-स्टार हॉस्पिटल खोल लेता है।
उस मालिक के लिए हॉस्पिटल के अंदर का मेडिकल स्टोर एक “मनी बैंक” है और आयुष्मान योजना का कार्ड “5 लाख का ब्लैंक चेक” है।
उस हॉस्पिटल में मरीज को lमरीज नहीं “क्लाइंट” समझा जाता है।
इसीलिए कहा जाने लगा है कि इन कॉर्पोरेट हॉस्पिटलों में मरीज का इलाज तब तक ही चलता है, जब तक दो चीजें न हो जाएं।
1. पर्स लेस – मतलब बटुए में पैसा खत्म।
2. पल्स लेस – मतलब नाड़ी बंद।
आज भी जहाँ हॉस्पिटल का मालिक खुद एक डॉक्टर है,वहाँ संवेदनाएँ बहुत बची हुई हैं। जहाँ मालिक व्यापारी है,वहाँ इलाज नहीं सौदा होता है।
-शैलेश पाठक, वरिष्ठ पत्रकार, कटनी
