
शहडोल जिले के विकासखण्ड बुढ़ार के अंतर्गत दुरूस्थ अंचल का जंगलो से घिरा हुआ ग्राम गोडि़नवूड़ा यहॉ जंगलो के बीच अधिकांशतः जन आदिम जाति तथा अनुसूचित जनजाति संवर्ग के है। वनो के संरक्षण एवं बचाव में इस आदिम जाति संवर्ग के सदस्य बढ़-चढ़ कर अपना योगदान देते है और इनकी आजीविका वनोपज पर आधारित है। संपूर्ण देश में 1 जनवरी 2008 से प्रभावशील वन आदिवासी अधिनियम 2008, नियम 2007 लाया गया जिसमें ऐसे वनवासी आदिवासी जिनकी आजीविका वनो से जुड़ी है व वन उपयोग खेती आदि हेतु वन को नुकसान किए बिना अपना जीवन यापन करते है तथा 13 दिसम्बर 2005 के पूर्व से वे काबिज है। उन्हें उक्त भूमि का हक प्रमाण दिए जाने का प्रावधान है।
वनवासी मुंगुलराम की खुशियों का ठिकाना न रहा जब उन्होंने वनाधिकार हक प्रमाण-पत्र के लिए आवेदन किया और उन्हें हक प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया। मुंगुलराम हक प्रमाण प्राप्त कर पूरे परिवार के साथ प्राप्त जमीन को उन्नतशील कृषि आधारित फसल तैयार की साथ प्राप्त जमीन के तीन हिस्से का शासकीय योजना का अभिसरण करते हुए उसके एक भाग में मिनाक्षी तालाब स्वीकृत कराया, दूसरे भाग में जैविक खाद का उपयोग करते हुए उन्नतशील सब्जी उत्पादन तथा तीसरे भाग में अनाज उत्पादन का कार्य प्रारम्भ किया। आज श्री मुंगुलराम और उनका परिवार कड़ी मेहनत और शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का उपयोग कर अपनी और अपने परिवार की जहां एक ओर आर्थिक स्तर को सुधारा, वही दूसरी ओर पूरा परिवार खुशहाल एवं शासन का शुक्रगुजार है। श्री मुंगुलराम का कहना है कि वे अपने नाती-पोतो को अच्छी शिक्षा दिलाकर उन्हें देश का अच्छा नागरिक बनाएंगे। आज ग्राम गोडि़नवूड़ा के श्री मुंगुलराम वन हक प्रमाण पत्र पाने वाले के लिए प्रेरणा है और श्री मुंगुलराम ने प्रदेश शासन के साथ-साथ जिले के कलेक्टर डॉ. सतेन्द्र सिंह, वनमण्डलाधिकारी एवं सहायक आयुक्त आदिम जाति कल्याण विभाग श्री आर.के. श्रौती को तहेदिल से धन्यवाद देते हुए कहा कि शासन की जनकल्याणकारी योजनाआंे से जुड़कर हर व्यक्ति अपना जीवन स्तर सुधार सकता है।