मध्य प्रदेश के हितों से समझौता कर भाजपा सरकार ने गुजरात के सामने किया सरेंडर, नर्मदा पर जारी करे श्वेत पत्र – कुणाल चौधरी
(भोपाल) अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव कुणाल चौधरी ने पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए नर्मदा नदी और मध्य प्रदेश के जल अधिकारों से जुड़े अत्यंत गंभीर विषय पर भाजपा सरकार को कठघरे में खड़ा किया। इस अवसर पर मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व प्रवक्ता कुंदन पंजाबी एवं विक्रम चौधरी भी उपस्थित रहे।
कुणाल चौधरी ने कहा कि नर्मदा मध्य प्रदेश की जीवन रेखा है। इसका उद्गम मध्य प्रदेश में होता है और लगभग 80 प्रतिशत प्रवाह इसी राज्य में है। यह प्रदेश के लिए ईश्वरीय कृपा है, लेकिन भाजपा सरकार ने गुजरात और केंद्र सरकार के सामने घुटने टेककर मध्य प्रदेश के हितों के साथ विश्वासघात किया है।

उन्होंने कहा कि नर्मदा वाटर डिस्प्यूट्स ट्रिब्यूनल (NWDT) ने नर्मदा के कुल 28 मिलियन एकड़ फीट (MAF) पानी के बंटवारे का ऐतिहासिक निर्णय दिया था, जिसके अनुसार मध्य प्रदेश को 18.25 MAF, गुजरात को 9 MAF, राजस्थान को 0.50 MAF तथा महाराष्ट्र को 0.25 MAF पानी आवंटित किया गया। ट्रिब्यूनल ने यह भी तय किया था कि वर्ष 2024-25 के बाद पानी के उपयोग और परियोजनाओं की तैयारियों की समीक्षा की जाएगी।
उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश का हमेशा यह तर्क रहा है कि नदी का जलग्रहण क्षेत्र प्रदेश में है तथा जंगलों की कटाई, भूमि का डूब क्षेत्र, लाखों लोगों का विस्थापन और जैव विविधता का सबसे अधिक नुकसान मध्य प्रदेश को उठाना पड़ता है, इसलिए सबसे बड़ा हिस्सा भी प्रदेश को मिलना चाहिए। सरदार सरोवर बांध गुजरात में बनाया गया, लेकिन बिजली उत्पादन और विस्थापन से जुड़े मुआवजे की जिम्मेदारी साझा करने का निर्णय भी ट्रिब्यूनल ने दिया था।
श्री चौधरी ने हाल ही में नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह विषय नर्मदा ट्रिब्यूनल और जल संसाधनों से जुड़ा है, फिर देश के गृह मंत्री इस मामले में हस्तक्षेप क्यों कर रहे हैं? यदि कोई बैठक होनी थी तो उसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री को करनी चाहिए थी। इस बैठक में मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री तथा केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उपस्थित थे।
उन्होंने आरोप लगाया कि इसी बैठक में मध्य प्रदेश के डूब क्षेत्र में गई सरकारी जमीनों और संपत्तियों के मुआवजे को लेकर प्रदेश के साथ सबसे बड़ा अन्याय किया गया। गुजरात सरकार को मध्य प्रदेश को ₹7,669 करोड़ का मुआवजा देना था, लेकिन मध्य प्रदेश सरकार ने अपना पूरा दावा छोड़ दिया और इसके विपरीत गुजरात सरकार को ₹550 करोड़ देने पर सहमति व्यक्त कर दी। यह मध्य प्रदेश के अधिकारों का खुला समर्पण है। पीड़ित राज्य से ही उल्टा पैसा वसूलने जैसा यह समझौता प्रदेश की जनता के साथ बहुत बड़ा धोखा है।
श्री चौधरी ने कहा कि कांग्रेस सरकारों ने हमेशा सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने का विरोध किया था, लेकिन वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे पहले बांध की ऊंचाई 138 मीटर से बढ़ाकर 192 मीटर करने की प्रक्रिया शुरू की गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अफ्रीका में रहते हुए इसे ऐतिहासिक बताया था, जबकि यह मध्य प्रदेश की सिंचाई व्यवस्था और भविष्य का कत्लेआम साबित हुआ। आज मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव उसी समर्पण की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि भाजपा के 21 वर्षों के शासन के बाद भी मध्य प्रदेश अपने हिस्से के 18.25 MAF पानी का पूरा उपयोग करने में विफल है। आज प्रदेश केवल लगभग 12 MAF पानी का ही उपयोग कर पा रहा है। सरकार ने 30 प्रस्तावित बड़े बांधों में से 18 परियोजनाएं समाप्त कर दीं तथा नर्मदा पर बनने वाले लगभग 300 छोटे जल निकायों की योजनाएं भी बंद कर दीं।
उन्होंने बरगी डायवर्जन परियोजना का उदाहरण देते हुए कहा कि यह परियोजना 40 महीने में ₹500 करोड़ की लागत से पूरी होनी थी, लेकिन 15-17 वर्षों बाद भी पूरी नहीं हो सकी और इसकी लागत बढ़कर लगभग ₹1,600 करोड़ हो गई। यह भाजपा सरकार की प्रशासनिक विफलता और भ्रष्टाचार का प्रमाण है।
श्री चौधरी ने कहा कि सरदार सरोवर परियोजना के कारण अनूपपुर, डिंडोरी, मंडला, जबलपुर, नर्मदापुरम (होशंगाबाद), सीहोर, देवास, हरदा, खंडवा, अलीराजपुर, खरगोन, बड़वानी और धार सहित अनेक जिले प्रभावित हुए हैं। बांध में डूबने वाली लगभग 55 प्रतिशत भूमि मध्य प्रदेश की है, जिसमें बड़ी मात्रा में सरकारी भूमि भी शामिल है। वास्तविक पुनर्वास तभी माना जाएगा जब विस्थापितों को सिंचित भूमि, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार उपलब्ध कराया जाए, लेकिन आज भी हजारों आदिवासी परिवार पूर्ण पुनर्वास की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
उन्होंने प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर भी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्ष 2003 में जब कांग्रेस सरकार ने सत्ता छोड़ी थी तब मध्य प्रदेश पर लगभग ₹2,000 करोड़ का कर्ज था, जो भाजपा शासन में बढ़कर लगभग ₹5 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। इतनी खराब आर्थिक स्थिति के बावजूद सरकार ने प्रदेश के ₹7,669 करोड़ के वैध अधिकार का परित्याग कर दिया, जिसका जवाब जनता को मिलना चाहिए।
कुणाल चौधरी ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस विकास की विरोधी नहीं है, लेकिन विकास की कीमत मध्य प्रदेश के हितों और आदिवासी परिवारों के अधिकारों की बलि देकर नहीं चुकाई जा सकती। उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से नर्मदा मुद्दे पर तत्काल श्वेत पत्र (White Paper) जारी करने की मांग करते हुए निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर देने को कहा—
1. मध्य प्रदेश सरकार गुजरात और केंद्र सरकार के सामने घुटने क्यों टेक रही है?
2. नर्मदा ट्रिब्यूनल के निर्णय के वर्षों बाद भी कितनी परियोजनाएं और नहरें अधूरी हैं?
3. बरगी डायवर्जन परियोजना की लागत तीन गुना से अधिक क्यों बढ़ गई?
4. आज भी कितने किसान सिंचाई से वंचित हैं और कितने आदिवासी परिवार पूर्ण पुनर्वास की प्रतीक्षा कर रहे हैं?
5. मध्य प्रदेश अपने हिस्से के पूरे 18.25 MAF पानी का उपयोग कब तक कर पाएगा?
श्री चौधरी ने कहा कि मुख्यमंत्री को इन सभी प्रश्नों का तथ्यात्मक उत्तर प्रदेश की जनता के सामने रखना चाहिए तथा नर्मदा और मध्य प्रदेश के हितों से जुड़े प्रत्येक निर्णय में पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए।
