टूरिंग टॉकीज: एक दौर की यादें, मेलों की जादूगरी और सिनेमा का सफर

 (कटनी) एक दौर था जब सिनेमा शहरों और कस्बों तक सीमित नहीं था। गांवों, मेलों और कस्बों में जहां स्थायी सिनेमाघर नहीं थे, वहां टूरिंग टॉकीज की ट्रक-घर वाली फिल्में पहुंच जाती थीं। बड़े-बड़े तंबुओं में, पुरानी रीलों के साथ, पूरी जज्बात वाली फिल्में दिखाई जाती थीं। लोग दूर-दूर से पैदल, बैलगाड़ी या बस से आते, टिकट खरीदते और घंटों तक स्क्रीन पर खो जाते। आज डिजिटल युग में सैटेलाइट टीवी, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और स्मार्टफोन के बीच ये यादें समुद्र की लहरों की तरह उभरती हैं—कभी-कभी भूली-बिसरी, कभी जीवंत।

टूरिंग टॉकीज का उदय और स्वर्ण युग
टूरिंग टॉकीज की परंपरा करीब एक सदी पुरानी है। 1970 के दशक में भारत भर में लगभग एक हजार ऐसे मोबाइल सिनेमा सक्रिय थे। ये ट्रक पर लदे तंबू, प्रोजेक्टर, जनरेटर और फिल्म की रीलें लेकर गांव-गांव घूमते। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार के साथ-साथ मध्य प्रदेश में भी ये खास तौर पर लोकप्रिय थे।

मध्य प्रदेश के सागर, भोपाल, जबलपुर, रीवा और अन्य क्षेत्रों में टूरिंग टॉकीज मेलों और गांवों की जान थे। सागर जैसे जिलों में जहां स्थायी सिनेमाघर सीमित थे, वहां मेले लगने पर टूरिंग टॉकीज का तंबू सबसे बड़ा आकर्षण बन जाता। लोग हफ्तों पहले से इंतजार करते कि कब ट्रक आएगा और फिल्में दिखाई जाएंगी।
शहरों से लौटे लोग या सिनेमा प्रेमी उद्यमी इसे अपना व्यवसाय बनाते। ट्रक को सजाकर, तंबू लगाकर, लाउडस्पीकर पर गाने बजाकर माहौल बनाया जाता। मेलों (जैसे गणेश उत्सव, रामलीला, नवरात्रि या स्थानीय मेलों) में ये सबसे बड़ा आकर्षण होते। रात को फिल्म शुरू होने से पहले पूरा इलाका रोशन हो जाता। बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं—सब एक साथ बैठकर फिल्म देखते। अमीर लोग कुर्सियों पर, बाकी जमीन पर चटाई या रेत पर।

मेलों में टूरिंग टॉकीज का माहौल
मेले टूरिंग टॉकीज के सबसे बड़े मंच थे। जहां घूमने-फिरने, झूलों, नौटंकी और मिठाइयों के साथ सिनेमा का जादू जुड़ जाता। मध्य प्रदेश के सागर सहित विभिन्न जिलों में मेलों के दौरान टूरिंग टॉकीज की धूम रहती। लोग महीनों पहले से इंतजार करते। तंबू के बाहर पोस्टर लगे होते—“आज की फिल्म: शोले” या “मुगल-ए-आजम”। अंदर घुसते ही ठंडी हवा, धूल-मिट्टी की खुशबू और उत्साह का माहौल।
कई लोग आज भी याद करते हैं: “सागर के मेले में पहली बार टूरिंग टॉकीज में ‘शोले’ देखी थी। पूरा गांव जमा था। गाने पर सब नाचने लगे थे।” महिलाएं घूंघट में, बच्चे मां की गोद में। बिजली न होने पर जनरेटर की आवाज के साथ फिल्म चलती। कभी-कभी रील फट जाती या जनरेटर बंद हो जाता, तो हंसी-मजाक का दौर चलता।

लोगों की यादें: समुद्र की लहरें
ये यादें व्यक्तिगत अनुभवों से भरी हैं। महाराष्ट्र के आनंद जागदले जैसे टूरिंग टॉकीज संचालक पिता से बेटे तक ये विरासत चली आ रही है। मध्य प्रदेश के कई गांवों और सागर जैसे क्षेत्रों में भी ऐसी कहानियां प्रचलित हैं। डॉक्यूमेंट्री द सिनेमा ट्रैवलर्स में दिखाया गया है कि कैसे ये लोग धूल भरी सड़कों पर ट्रक लेकर गांव पहुंचते, फिल्म दिखाते और खुशी बांटते।

एक बुजुर्ग की याद: “मध्य प्रदेश के सागर जिले के मेले में टूरिंग आता तो लगता स्वर्ग आ गया। टिकट दस-पच्चीस पैसे का। पूरा परिवार जाता। रात भर जागकर फिल्म देखते। सुबह घर लौटते तो मुंह पर मुस्कान होती।”

चुनौतियां और बदलता दौर
टूरिंग टॉकीज को कई चुनौतियां थीं—खराब सड़कें, महंगे प्रोजेक्टर पार्ट्स, पुलिस परमिट, मौसम। लेकिन लोगों का उत्साह उन्हें चलाए रखता। 1990-2000 के बाद टीवी, वीडियो कैसेट, केबल और अब डिजिटल स्ट्रीमिंग ने इसे लगभग समाप्त कर दिया। आज मुश्किल से दस-पंद्रह बचे होंगे।
फिर भी कुछ जगहों पर नॉस्टैल्जिया जीवित है। मध्य प्रदेश के कुछ गांवों और सागर क्षेत्र में भी कभी-कभी पुराना माहौल याद दिलाया जाता है।

निष्कर्ष: यादों का सिनेमा
टूरिंग टॉकीज सिर्फ फिल्म दिखाने का साधन नहीं था—ये सामुदायिक उत्सव था, सपनों का वाहन था, गांवों को शहर से जोड़ने वाला पुल था। आज डिजिटल युग में हर कोई घर बैठे फिल्म देख लेता है, लेकिन उस सामूहिक उल्लास, धूल-मिट्टी की खुशबू और स्क्रीन की चमक का जादू कहीं और नहीं।

एक दौर था, एक दौर है। यादें बाकी हैं। कभी भटकते हुए किसी मेले में अगर टूरिंग टॉकीज का तंबू दिखे, तो जरूर रुकना। क्योंकि वहां सिर्फ फिल्म नहीं, बचपन, जवानी और पूरे गांव की सामूहिक खुशियां दोहराई जाती हैं।
✍️ हरी शंकर पाराशर
         प्रदेश संयोजक
  RPKP INDIA NEWS

Share this:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

यह भी देखें