देवोत्थान एकादशी के संदर्भ में एक अनमोल चिंतन ….. रवींद्र सिंह ( मंजू सर) मैहर की कलम से
देवोत्थान एकादशी की मंगल बधाई
(मैहर) चतुर्मास पश्चात भगवान श्रीनारायण हरि के निद्रा से जागरण का पावन दिवस ही देवोत्थान एकादशी के रूप में मनाया जाता है। भारतीय सनातन परंपरा में अनेकों पर्व त्यौहार मनाए जाते हैं एवं सभी पर्व त्यौहार अपने आप में कुछ विशिष्ट सीखों को धारण किए हुए हैं। मनुष्य के भीतर दैवीय गुणों को एवं मानवीय चेतना में सुषुप्त देवत्व को जागृत करना ही देवोत्थान एकादशी व्रत का मुख्य उद्देश्य है।
रवींद्र सिंह मंजू सर मैहर की कलम कहती है कि यदि हृदय में सत्कर्म करने की भावना जग जाए, सत्य के मार्ग पर चलने का भाव जग जाए तो यही जीव की वास्तविक जागृति है और यही मानव जीवन का वास्तविक जागरण भी है। भगवान नारायण ही धर्म स्वरूप हैं। हमारे भीतर भी धर्म का जागरण होना चाहिए। भगवान का बैकुंठ में जागना तो महत्व रखता ही है साथ ही प्रभु से प्रार्थना करें कि वे हमारे हृदय रूपी बैकुंठ में भी जग कर हमारे इस मानव जीवन को श्रेष्ठता की ओर अग्रसर करें।देवप्रबोधिनी एकादशी को देव उठनी एकादशी और देवुत्थान एकादशी के नाम से भी जाना जाता है इस वर्ष देव प्रबोधिनी एकादशी स्मार्त एवं वैष्णव दोनों ही मत के अनुयायियों के द्वारा आज मंगलवार 12 नवम्बर को मनाई जा रही है।
रवींद्र सिंह मंजू सर मैहर की कलम कहती है कि हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस दिन से विवाह, गृह प्रवेश तथा अन्य सभी प्रकार के मांगलिक कार्य आरंभ हो जाते हैं। माना जाता है कि भगवान श्रीविष्णु ने भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी को महापराक्रमी शंखासुर नामक राक्षस को लम्बे युद्ध के बाद समाप्त किया था और थकावट दूर करने के लिए क्षीरसागर में जाकर सो गए थे और चार मास पश्चात फिर जब वे उठे तो वह दिन देव उठनी एकादशी कहलाया। इस दिन भगवान श्रीविष्णु का सपत्नीक आह्वान कर विधि विधान से पूजन करना चाहिए। इस दिन उपवास करने का विशेष महत्व है और माना जाता है कि यदि इस एकादशी का व्रत कर लिया तो सभी एकादशियों के व्रत का फल मिल जाता है और व्यक्ति सुख तथा वैभव प्राप्त करता है और उसके पाप नष्ट हो जाते हैं।
