(आख़िर ये कैसे जानेंगे दर्द)- सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं पढ़ते राजनेताओं के बच्चे…?

“जब तक विधायक, मंत्री और अफसरों के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते रहेंगे, तब तक सरकारी स्कूलों की हालत नहीं सुधरेगी। अनुभव से नीति बनती है, और सत्ता के पास उस अनुभव का अभाव है। स्कूलों में छत गिरने से मासूमों की मौत, किताबों की कमी, अधूरे शौचालय — ये सब आम जनता के हिस्से में ही क्यों? यह समय की मांग है कि जनप्रतिनिधि और अधिकारी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाएँ, ताकि वे खुद देख सकें कि किस शिक्षा व्यवस्था को वे बेहतर बनाने का दावा कर रहे हैं।”
✍️ डॉ. सत्यवान सौरभ

देश के किसी भी कोने में जाइए, एक दृश्य लगभग समान मिलेगा —सरकारी स्कूलों की टूटी छतें, जर्जर दीवारें, अधूरी दीवारों पर टंगे नामपट्ट, शिक्षकों की भारी कमी, और बच्चों की आँखों में सपनों की भी क्षीण रोशनी। वहीं दूसरी ओर शिक्षा के नाम पर चमचमाते निजी स्कूल, लाखों की फीस, स्मार्ट क्लास, और सत्ताधारियों के बच्चे उसी में दाखिल। ऐसे में सवाल उठता है — “जो नीति बनाते हैं, क्या उन्हें खुद कभी उस नीति की आग में तपना पड़ता है?”

सत्ता और शिक्षा का यह विभाजन
राजस्थान के कोटा में प्रकाशित यह रिपोर्ट एक कड़वी सच्चाई को उजागर करती है। जब पत्रकारों ने मंत्रियों, विधायकों, अफसरों से पूछा कि क्या उनके बच्चे या पोते-पोतियाँ सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, तो अधिकतर जवाब आया — “नहीं, हमारे बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं” या “अभी स्कूल जाने योग्य नहीं हैं”। क्या यही जवाब किसी आम नागरिक का होता? अगर मंत्री या कलेक्टर के अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में जाते, तो क्या स्कूल की छतें गिरी होतीं? क्या मासूम बच्चे मलबे में दबकर मरते? क्या आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियाँ सिर्फ इसलिए स्कूल छोड़ देतीं क्योंकि वहाँ शौचालय नहीं है?

सत्ता को अनुभव नहीं, सिर्फ आँकड़े चाहिए
नीति निर्धारण अब आंकड़ों की बाज़ीगरी बनकर रह गया है। शिक्षा बजट में वृद्धि, स्कूलों की संख्या, छात्रवृत्तियों के नाम पर योजनाएँ — सब कुछ एक रिपोर्ट कार्ड की तरह पेश किया जाता है। मगर ज़मीनी हकीकत क्या है? शिक्षक चार जिलों की दूरी तय करके ड्यूटी करते हैं, स्कूलों में पीने का पानी तक नहीं, बच्चों को किताबें समय पर नहीं मिलतीं। और सबसे बड़ी विडंबना — इन हालातों को सुधारने की ज़िम्मेदारी उन्हीं के हाथ में है, जिनके अपने बच्चे इन हालातों से अछूते हैं।

क्या होना चाहिए अनिवार्य?
आख़िरकार यह सवाल बार-बार उठता है —
“जब तक मंत्रियों, विधायकों और प्रशासनिक अधिकारियों के अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे, तब तक सुधार की कोई भी कोशिश दिखावटी होगी।” क्या यह कानूनन अनिवार्य नहीं किया जा सकता कि: विधायक/सांसद बनने के लिए उम्मीदवार को यह शपथ लेनी होगी कि उसका बच्चा सरकारी विद्यालय में ही पढ़ेगा। सरकारी अधिकारियों(IAS/IPS/IRS) की पदस्थापना की शर्त में शामिल हो कि वे अपने बच्चों को निजी स्कूलों में नहीं भेजेंगे। जिन शिक्षकों के बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे हैं, उन्हें पहले अपने स्कूल पर भरोसा दिखाना होगा। यह कोई सनकी मांग नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में समानता और जवाबदेही का आधार है। जब आम नागरिक को सरकारी सेवाओं से संतुष्ट रहने की सलाह दी जाती है, तो नीति-निर्माताओं के लिए भी वह संतोष अनिवार्य क्यों नहीं?

आशा और आक्रोश का संगम
हमें यह स्वीकार करना होगा कि आम जनता की चुप्पी ही सबसे बड़ा अपराध बन चुकी है। जब कोई बच्चा सरकारी स्कूल की जर्जर छत के नीचे दम तोड़ता है, तब सिर्फ अफसोस जताने से कुछ नहीं बदलता। जब तक हम यह नहीं कहेंगे —
“पहले आपके बच्चे इस स्कूल में पढ़ें, फिर हमें यहाँ भेजिए,”
तब तक शिक्षा सिर्फ चुनावी वादा बनी रहेगी।

वास्तविक उदाहरणों की मांग
दिल्ली सरकार ने कुछ हद तक यह पहल की कि उनके मंत्री सरकारी स्कूलों में समय-समय पर निरीक्षण करें, लेकिन निरीक्षण और अनुभूति में जमीन-आसमान का फर्क है। जो माँ-बाप हर दिन अपने बच्चे को पानी की बोतल के साथ भेजते हैं, वे सरकारी स्कूलों की सूखी टंकी नहीं समझ सकते। जो बच्चे हर दिन निजी बस से स्कूल जाते हैं, उन्हें स्कूल वैन की कमी कभी नहीं चुभेगी।

मीडिया की भूमिका
यह बात सराहनीय है कि दैनिक भास्कर जैसे समाचार पत्र इस विषय को सामने ला रहे हैं। जब मुख्यधारा मीडिया तमाशे और सनसनी से आगे बढ़कर व्यवस्था के मूल पर चोट करता है, तब जागरूकता की शुरुआत होती है। ऐसे प्रयासों को और मजबूत करने के लिए ज़रूरी है कि हम, आप और हर पाठक इसे जन-चर्चा का हिस्सा बनाएँ।

एक आम नागरिक की घोषणा
हर मतदाता को आने वाले चुनावों में यह एक सवाल तय करना चाहिए —”आपका बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़ता है या नहीं?” यदि नहीं, तो उसे हमारे बच्चों के भविष्य की योजनाएँ बनाने का अधिकार नहीं।

शिक्षा के लोकतांत्रिककरण की माँग
शिक्षा सिर्फ सेवा नहीं, यह लोकतंत्र का आधार स्तंभ है। और जब यह स्तंभ एक वर्ग विशेष के लिए ‘निजी सुविधा’ और बाकी देश के लिए ‘सरकारी मजबूरी’ बन जाए, तो असमानता अपने चरम पर होती है।

सरकारी स्कूल तब तक नहीं सुधरेंगे,
जब तक उनकी छतों के नीचे
‘किसी मंत्री का बेटा’ किताब न खोले।
जब तक कोई ‘अफसर की बेटी’
लाइन में खड़े होकर मिड डे मील न खाए।
जब तक कोई ‘विधायक का पोता’
ब्लैकबोर्ड पर ABCD न लिखे।

शिक्षा का अधिकार केवल किताबों में नहीं, सच्चाई में होना चाहिए। यदि हम सच में चाहते हैं कि सरकारी स्कूल सुधरें —
तो पहला सुधार वहीं से शुरू होना चाहिए,
जहाँ से नीति बनती है — सत्ता के गलियारों से।

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जिले में वर्षा ऋतु के दौरान सर्पदंश की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर आमजन को सर्प-दंश से बचाव, प्राथमिक सावधानियों तथा समय पर उपचार उपलब्ध कराने के लिए कलेक्‍टर श्री आशीष तिवारी ने विस्‍तृत दिशा-निर्देश दिए हैं। सर्प-दंश से बचाव के लिए जिले के सभी पंचायत एवं शहरी वार्ड पर जन-जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। जागरूकता कार्यक्रम के तहत होर्डिंग, प्रिंट मीडिया, सोशल मीडिया तथा एफएम रेडियो के माध्यम से जिंगल्स प्रसारित कर लोगों को सर्प-दंश से बचाव के उपायों की जानकारी दी जाएगी। स्कूल, कॉलेज, चौपाल और स्थानीय कार्यक्रमों में भी जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे। इसके लिए आम नागरिकों को विशेष रूप से झाड़-फूंक में समय न गंवाने और सर्प-दंश के बाद गोल्‍डन हावर में सीधे अस्पताल पहुंचने के लिए जागरूक किया जाएगा। प्रदेश में सर्प-दंश से होने वाली जनहानि को देखते हुए म.प्र. राज्‍य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण भोपाल द्वारा सर्पदंश को स्थानीय आपदा घोषित किया गया है। प्रदेश में पिछले वर्ष सर्प-दंश से 2,500 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई थी। सर्प मित्रों और रेस्क्यू टीम को दिया जाएगा प्रशिक्षणस्‍नैक केचर्स, सर्प मित्र, होमगार्ड, एसडीईआरएफ एवं स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को आवश्यक एवं उन्नत प्रशिक्षण दिया जाएगा। प्रशिक्षित सर्प मित्रों का डेटाबेस तैयार कर उनकी जानकारी पंचायत एवं वार्ड स्तर पर उपलब्ध कराई जाएगी। जरूरत पड़ने पर नागरिक इनसे संपर्क कर सकेंगे। सर्प मित्रों को सुरक्षित रेस्क्यू के लिए स्‍नेक रेस्‍क्‍यू किट तथा फर्स्‍ट एड किट उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी की जाएगी। अस्पतालों में एंटी-वीनोम का पर्याप्त भंडारणकलेक्‍टर श्री तिवारी ने सर्प-दंश पीड़ितों के त्वरित उपचार के लिए शासकीय चिकित्सालयों में आवश्यक उपकरण, दवाएं एवं एंटी-वीनोम का पर्याप्त भंडारण सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। स्वास्थ्य संस्थानों में सर्प-दंश के मामलों में तत्काल उपचार की व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। खेतों और जंगलों में कार्य करते समय बरतें सावधानीसर्प-दंश की घटनाओं को रोकने के लिए आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा स्वच्छता एवं साफ-सफाई पर विशेष जोर दिया गया है। खेतों एवं जंगलों में कार्य करने वाले लोगों को लंबे जूते और मोटे दस्ताने पहनने की सलाह दी गई है। पशुओं के बाड़ों में पर्याप्त रोशनी तथा जाली/बैरियर की व्यवस्था करने के निर्देश भी दिए गए हैं। पर्यटन स्थलों एवं सर्प-प्रवण क्षेत्रों में चेतावनी बोर्ड तथा स्‍नैक आईडेंटिटीफिकेशन बैनर लगाए जाएंगे, ताकि लोगों को संभावित खतरे की जानकारी मिल सके। जिला स्तर पर तैयार होगा सर्प-दंश का डाटाबेसकलेक्टर श्री तिवारी के निर्देश पर सर्प-दंश की घटनाओं का जिला स्तरीय डाटाबेस तैयार किया जाएगा। डिस्‍ट्रीक्‍ट डिजास्‍टर मैनेजमेंट प्‍लान में सर्प-दंश को रिस्‍क एनालिसिस एवं एसओपी में शामिल किया जाएगा। साथ ही जीआईएस मानचित्र के माध्यम से सर्प-दंश की घटनाओं तथा संबंधित प्रजातियों का वर्गीकरण और डाटाबेस तैयार करने की व्यवस्था की जाएगी। सर्प-दंश से बचाव के लिए नागरिक अपनाएं ये सावधानियां सर्प-दंश से बचाव के लिए नागरिको को सलाह दी गई है कि वे जूते, कपड़े और स्लीपिंग बैग का उपयोग करने से पहले अच्छी तरह झाड़ लें। इसी प्रकार रात में, बारिश के बाद तथा झाड़ियों या पेड़ों के आसपास जाते समय टॉर्च और छड़ी का उपयोग करें। वहीं जमीन पर सोने के बजाय पलंग/खाट एवं मच्छरदानी का प्रयोग करें। इसी प्रकार सांप को छेड़ें नहीं, उस पर हमला न करें और न ही उसे पकड़ने का प्रयास करें। जबकि घर के आसपास घास, कबाड़, गड्ढे और कचरा जमा न होने दें। इसके अलावा पानी का मटका जमीन से ऊपर स्टैंड पर रखें। सर्प-दंश के संभावित लक्षणसर्प-दंश के बाद काटने वाली जगह पर दर्द, सूजन, लालिमा अथवा नीला पड़ना और दांत के निशान दिखाई दे सकते हैं। इसके अलावा उल्टी, जी मिचलाना, अकड़न, कंपकंपी, पसीना, लो ब्लड प्रेशर, पेट दर्द, दस्त, कमजोरी एवं अत्यधिक प्यास जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं। गंभीर विषैले सर्प के दंश में आंखें खोलने या बोलने में कठिनाई, सांस लेने में परेशानी तथा अन्य गंभीर लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में बिना समय गंवाए तत्काल अस्पताल पहुंचना आवश्यक है। सर्प-दंश के बाद क्या करें?प्रशासन द्वारा नागरिको को सलाह दी गई है कि सर्प-दंश होने पर शांत रहें और मरीज को आराम दें तथा प्रभावित अंग को स्थिर रखें। मरीज को जल्द से जल्द निकटतम अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाएं। इसके अलावा घाव को साफ एवं खुला रखें। जबकि ढीली पट्टी बांधी जा सकती है, लेकिन रक्त प्रवाह को पूरी तरह बाधित न करें। सांप का रंग और आकार याद रखने का प्रयास करें, लेकिन सांप को पकड़ने या मारने की कोशिश बिल्कुल न करें। सर्प-दंश के बाद ये काम बिल्कुल न करेंसर्पदंश के बाद घाव को काटें या विष चूसने का प्रयास न करें। इसी प्रकार आइस पैक न लगाएं। घाव पर साबुन या रसायन न लगाएं। जबकि मरीज को अल्कोहल या कैफीन का सेवन न कराएं। वहीं स्वयं से कोई दवा या मरहम न दें। इसी प्रकार सपेरे, तांत्रिक अथवा झाड़-फूंक के चक्कर में समय बर्बाद न करें।

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