हम आत्मा हैं और परमात्मा के अंश हैं: पं सुरेन्द्र दुबे

(विजयराघवगढ़) प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में ऐसा समय आता है जब वह महसूस करता है कि उसका यह भौतिक शरीर, सौन्दर्य, एक दिन नष्ट हो जाएगा उसके संगी- साथियों के शरीर भी एक दिन मृत्यु को प्राप्त हो जाएंगे। इससे बचने का कोई रास्ता नहीं है।

जब हम स्वयं को आत्मा के रूप में पहचान लेंगे, तब हम खुद को भौतिक अस्तित्व की जंजीरों में बंधा हुआ नहीं पायेंगे, तब हमें यह अनुभव होगा कि हमारी आत्मा पर इस भौतिक जगत का कोई औचित्य नहीं है,यह आम तत्व से बना है,यह प्रभु के सार से ही बना हुआ है, तथा अमर है।

अपने सच्चे स्वरूप की खोज अगर हम बाहरी संसार में करेंगे तो हमें निराशा ही हाथ लगेगी। इस भ्रम को हटाने का और अपने स्वरूप को जानने का केवल एक ही तरीका है कि अपने अंतर्मन में ध्यान टिकायें और स्वयं यह अनुभव करें कि हम आत्मा हैं और परमात्मा के अंश हैं।

यदि हम भीतर से अच्छे हैं, तो हमारे चेहरे से हमारी “अच्छाईयाँ” झलकेंगी/ दिखाई देंगी। क्योंकि बाहरी सुन्दरता समय के साथ धुँधला जाती है, परन्तु “आन्तरिक सौन्दर्य” समय के साथ-साथ और भी खिलती जाती है,
इसलिए .., उस सौन्दर्य की इच्छा रखनीचाहिए, जो हमारे आंतरिक सौन्दर्य को प्रतिबिम्बित कर सके। जहाँ बाहरी सौन्दर्य तो समय के साथ-साथ बुढ़ा होते जाता है, झुर्रियां दिखने लगती हैं। आंतरिक सौन्दर्य समय अनुभव के साथ-साथ बढ़ता है।

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