दांपत्य: (पति एवं पत्नी) जीवन-यात्रा का अंतिम सहयात्री ….. रवींद्र सिंह (मंजू सर ) मैहर की कलम से

मैहर वाली शारदा माता धाम से एक अनमोल चिंतन

(मैहर) जीवन को यदि एक लंबी रेल-यात्रा माना जाए, तो इस यात्रा में अनेक यात्री हमारे साथ जुड़ते हैं—माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, संतान नाती पंती और अन्य संबंधी। हर संबंध का अपना महत्व, अपना समय और अपनी भूमिका होती है। किंतु समय और परिस्थितियों के अनुसार ये संबंध अपने-अपने “स्टेशन” पर उतर जाते हैं। माता-पिता हमें जन्म देकर और संस्कार देकर अपनी भूमिका पूर्ण करते हैं; मित्र जीवन के किसी विशेष पड़ाव तक साथ चलते हैं; संतान पुत्र पुत्री अपने जीवन की दिशा में आगे बढ़ जाती है। परंतु इस समूची यात्रा में यदि कोई एक संबंध अंत तक साथ निभाने का संकल्प लेता है, तो वह है पति और पत्नी का संबंध।

रवींद्र सिंह (मंजू सर )मैहर की कलम कहती है कि दांपत्य (पति और पत्नी) केवल सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि भावनात्मक, मानसिक और आध्यात्मिक साझेदारी है। यह वह बंधन है जिसमें दो व्यक्ति सुख-दुख, उतार-चढ़ाव, संघर्ष और उपलब्धियों—सबका साझा अनुभव करते हैं। जब जीवन में आर्थिक संकट आता है, तो यही साथी संबल बनता है; जब स्वास्थ्य डगमगाता है, तो यही हाथ थामकर सहारा देता है; और जब सफलता मिलती है, तो वही सच्चा सहभागी बनकर प्रसन्नता को दोगुना कर देता है।पति-पत्नी का संबंध समय के साथ परिपक्व होता है। प्रारंभ में आकर्षण और नवीनता का भाव होता है, परंतु धीरे-धीरे यह संबंध विश्वास, समझ और त्याग की मजबूत नींव पर खड़ा हो जाता है। यह वह रिश्ता है जिसमें दोनों एक-दूसरे की कमजोरियों को स्वीकार करते हैं और गुणों को सराहते हैं। जीवन की संध्या बेला में, जब अधिकांश रिश्ते दूर हो चुके होते हैं, तब यही साथी सबसे निकट और सबसे आवश्यक होता है।

रवींद्र सिंह (मंजू सर) मैहर की कलम इसे एक उदाहरण से प्रस्तुत करती है कि मान लीजिए एक दंपति— हरि और लक्ष्मी । विवाह के बाद उन्होंने जीवन की शुरुआत साधारण आय और सीमित संसाधनों से की। प्रारंभिक वर्षों में आर्थिक तंगी रही, पर दोनों ने मिलकर हर कठिनाई का सामना किया। समय के साथ बच्चों का जन्म हुआ, वे बड़े हुए और उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहर चले गए। माता-पिता का देहांत हो गया, मित्र भी अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो गए।अब जीवन की ढलती उम्र में जब घर शांत है, तब हरि और लक्ष्मी ही एक-दूसरे के सच्चे सहयात्री हैं। वे पुरानी यादों को साझा करते हैं, एक-दूसरे की दवाइयों का ध्यान रखते हैं और छोटी-छोटी बातों में खुशी खोज लेते हैं। यही वह अवस्था है जहाँ यह सत्य स्पष्ट होता है कि जीवन-यात्रा में अंतिम स्टेशन तक साथ देने वाला यदि कोई है, तो वह जीवनसाथी ही है।

इस प्रकार, मेरी कलम कहती है कि पति-पत्नी का संबंध केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन-यात्रा की सबसे स्थायी और सार्थक साझेदारी है। यह रिश्ता हमें सिखाता है कि सच्चा साथ वही है, जो परिस्थितियों से परे, समय की सीमाओं से ऊपर उठकर निभाया जाए।।

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