जबलपुर की लहर में, भरी समंदर पीर, ममता का वह रूप था, ईश्वर की तस्वीर

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जबलपुर की लहर में, भरी समंदर पीर,
ममता का वह रूप था, ईश्वर की तस्वीर॥

क्रुज की उस चीख में, गूँजी करुण पुकार,
जब माँ बेटे के लिए, उतरी स्वयं मंझधार।
जीवन देकर प्रेम ने, खींची नई लकीर—
जबलपुर की लहर में, भरी समंदर पीर॥

अपनी साँसें वारकर, थामा उसका हाथ,
ममता की उस छाँव में, जग देखे सौगात।
तन भले बहता गया, अडिग रहा वह धीर—
जबलपुर की लहर में, भरी समंदर पीर॥

रो पड़े सभी देखकर, वह करुणा की तस्वीर,
पत्थर दिल भी पिघल गए, जागी ऐसी पीर।
आँखों में इतिहास-सा, ठहर गया वह नीर—
जबलपुर की लहर में, भरी समंदर पीर॥

माँ का रिश्ता प्रेम का, पावन और महान,
हर पीड़ा सह ले मगर, रखे सदा संतान।
संतति-हित अर्पित करे, जीवन सदा अधीर—
जबलपुर की लहर में, भरी समंदर पीर॥

लहरों ने तन हर लिया, पर ममता की जीत,
जबलपुर की धरा पर, अमर हुई वह प्रीत।
बलिदान की गाथा यह, पेश हुई नज़ीर —
जबलपुर की लहर में, भरी समंदर पीर॥

जागो हे इंसान अब, समझो माँ का मान,
चरण-धूलि इसकी लिए, जीवन का सम्मान।
इस धरती के देव को, कर लो नमन गंभीर—
जबलपुर की लहर में, भरी समंदर पीर॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ

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