सोमरस शराब नहीं था — यह वैदिक काल का पवित्र और औषधीय पेय था

मैहर। आजकल सनातन धर्म को लेकर बहुत भ्रम फैलाए जा रहे हैं। उन्हीं में से एक भ्रम है “सोमरस” को लेकर। कई लोग, खासकर टीवी-फिल्मों और अधूरी जानकारी के कारण, यह मान बैठे हैं कि देवता लोग भी शराब पीते थे और उसी को सोमरस कहा जाता था। लेकिन वैदिक साहित्य को ध्यान से पढ़ें तो यह बात गलत साबित होती है।

रवींद्र सिंह मंजू सर मैहर की कलम कुछ बिंदुओं के माध्यम से ग्रंथों के आकलन के आधार पर कुछ लेखन प्रस्तुत कर रही है जो कि अग्रलिखित है…

वेदों में “सोम” और “सुरा”अलग-अलग हैं ऋग्वेद और अन्य वेदों में दो शब्द अलग-अलग अर्थ में आए हैं: सोमरस यह एक पवित्र, शुद्ध और यज्ञ में चढ़ाया जाने वाला पेय था। इसे बल, बुद्धि, ऊर्जा और उत्साह देने वाला दिव्य रस कहा गया है।

सुरा: इसका मतलब शराब या मादक पेय है। वेदों में सुरापान को बुरी आदत और तामसिक प्रवृत्ति से जोड़ा गया है।यानी सोम सुरा।
दोनों को एक मानना वेदों का गलत अर्थ निकालना है।

सोमरस कैसे बनता था? प्राचीन काल में “सोम” नाम की एक विशेष लता या वनस्पति से रस निकाला जाता था। इस रस में दूध, दही, घी या शहद मिलाकर यज्ञ की विधि से ग्रहण किया जाता था। इसका उद्देश्य नशा करना नहीं था, बल्कि शरीर और मन को पुष्ट करना, चेतना को जगाना और यज्ञ की ऊर्जा को बढ़ाना था। कई विद्वान इसे एक औषधीय, सात्त्विक पेय मानते हैं।

ऋग्वेद में अग्नि और इंद्र देवता के लिए सोमरस की आहुति देने का वर्णन है। उस समय यज्ञ सिर्फ पूजा नहीं था, बल्कि प्रकृति, स्वास्थ्य और मन के संतुलन का तरीका भी था। सोमरस इस पूरी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

आज सोमरस का स्वरूप क्या है? आज सोम नाम की वह वनस्पति लगभग विलुप्त मानी जाती है। लेकिन मंदिरों में मिलने वाला “पंचामृत” या “चरणामृत” — जिसमें दूध, दही, घी, शहद और शक्कर होते हैं — उसे सोमरस की सांस्कृतिक परंपरा का रूप माना जा सकता है। उद्देश्य वही है: शुद्धता, ऊर्जा और सात्त्विकता।

देवताओं की गलत छवि क्यों न बनाएं? आजकल धारावाहिकों में इंद्र और अन्य देवताओं को भोग-विलास और शराब पीने वाला दिखाया जाता है। लेकिन वेदों में इंद्र को शक्ति, वीरता, बादल, ऊर्जा और दिव्य चेतना का प्रतीक बताया गया है।काल्पनिक सीरियल की छवि को सनातन सत्य मान लेना ठीक नहीं।

रवींद्र सिंह मंजू सर मैहर की कलम निष्कर्ष रूप से कहती है कि सनातन धर्म आत्मसंयम, सात्त्विकता और चेतना को ऊपर उठाने का मार्ग है। शराब को “सोमरस” कहना न केवल वेदों की गलत व्याख्या है, बल्कि एक पवित्र वैदिक परंपरा का अपमान भी है। याद रखें: सोमरस कोई शराब नहीं थी। वह वैदिक युग का पवित्र, औषधीय, ऊर्जा देने वाला और यज्ञीय पेय था, जिसे देवत्व और सात्त्विकता का प्रतीक माना गया।

किसी ने मुझसे यह कहा था कि सोमरस और शराब एक ही है प्राचीनतम समय में देवता गण भी इसका उपभोग करते थे इसलिए एक तुलनात्मक लेखन कलम के माध्यम से लिखने का प्रयास किया हूं। कल्याण,अखंड ज्योति के पुस्तक का संकलन का अंश समाहित है।

✍️ रवींद्र सिंह (मंजू सर)
   RPKP INDIA NEWS
                मैहर

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