जंतर मंतर पर उभरता विरोध: सरकार, माता-पिता और मीडिया के खिलाफ तीन मोर्चे
कटनी (RPKP INDIA NEWS) जंतर मंतर दिल्ली का वह ऐतिहासिक स्थल है जहाँ लोकतंत्र की आवाज़ अक्सर गूंजती रही है। हाल के आंदोलनों में एक बार फिर हजारों लोग सड़कों पर उतरे। लेकिन इस बार की कहानी सिर्फ सत्ता के खिलाफ नहीं है। आंदोलन के बीच से तीन अलग-अलग तरह के विरोध की गूँज निकलकर सामने आ रही है—सरकार के खिलाफ, माता-पिता के खिलाफ और मीडिया के खिलाफ। ये तीनों मोर्चे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और देश की मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक हालात को लेकर गहरी बेचैनी दर्शाते हैं।
सरकार के खिलाफ विरोध: समझ में आने वाली नाराजगी
सरकार के खिलाफ विरोध, कोई नई बात नहीं। जब नीतियाँ जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरतीं, जब बेरोजगारी, महँगाई या संस्थागत कमजोरियाँ बढ़ती हैं, तो लोग सड़क पर उतरते हैं। जंतर मंतर पर हुए हाल के आंदोलन में भी यही नाराजगी साफ दिखी। इस्तीफे की माँग उठी, आलोचना हुई और आगे भी सरकार के खिलाफ विरोध के दर्शन होते रहेंगे। यह लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। जब तक सत्ता जवाबदेह रहती है, तब तक यह विरोध स्वस्थ भी माना जा सकता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब विरोध सिर्फ सत्ता तक सीमित नहीं रहता और घर-परिवार तथा सूचना माध्यमों तक पहुँच जाता है।
माता-पिता के खिलाफ विरोध: पीढ़ियों का टकराव और सवालों की बौछार
सबसे चौंकाने वाला पहलू माता-पिता के खिलाफ उभरता विरोध है। यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि कई जगहों पर सुनाई देने वाली कहानियों का हिस्सा बन गया है। एक कहानी जंतर मंतर वाले आंदोलन से जुड़ी है। एक बच्चे की, जिसका पिता नेता हैं। बच्चा आंदोलन में जाने की जिद करता है। पिता समझाते हैं—“वहाँ जाने की जरूरत नहीं, तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो।” बच्चा पलटकर सवाल करता है—“आखिरी आंदोलन में जाने से क्यों रोक रहे हो? मेरे पिताजी पहले कैसे गरीब थे? एक सता धारी दल में जाने के बाद उन्होंने कैसे पैसे कमाए? उनकी ड्राइवर की तनख्वाह 40 हजार रुपये बताई जाती है। अगर ऐसी स्थिति रही और आप प्रधानमंत्री बन गए तो आप तो कुछ करोड़ रुपये में हमें भी बेच दोगे।”
ये सवाल सिर्फ एक बच्चे के नहीं हैं। ये उन हजारों युवाओं के सवाल हैं जो परिवार की समृद्धि और राजनीतिक सत्ता के बीच का रिश्ता समझने की कोशिश कर रहे हैं। वे पूछ रहे हैं कि सत्ता में आने के बाद आर्थिक स्थिति में इतना बड़ा बदलाव कैसे आया। वे पूछ रहे हैं कि नैतिकता और राजनीतिक लाभ के बीच रेखा कहाँ खिंचती है। माता-पिता के खिलाफ यह विरोध घोषित रूप में कई जगहों पर दिख रहा है। यह पीढ़ियों का टकराव है, जहाँ युवा पीढ़ी पुरानी पीढ़ी के समझौतों और चुप्पियों को चुनौती दे रही है। परिवार की दीवारें अब सवालों के आगे कमजोर पड़ रही हैं।
मीडिया के खिलाफ विरोध: विश्वास का संकट
तीसरा मोर्चा मीडिया के खिलाफ है। यह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण है। भारतीय मीडिया लंबे समय से लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता रहा है। लेकिन आज जनता का एक बड़ा हिस्सा मीडिया को अपने हितों से बँधा हुआ मानता है। विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत की रैंकिंग 157वें स्थान के आसपास बताई जाती रही है। फिर भी मीडिया गर्व से कहता है कि वह स्वतंत्र है। जनता पूछ रही है—स्वतंत्रता अगर सिर्फ स्वार्थों से बँधी हो तो उसकी कीमत क्या?
जंतर मंतर के आंदोलन के बाद यह विरोध और साफ हो गया। लोग मीडिया पर आरोप लगा रहे हैं कि वह असली सवालों को दबाता है, पक्षपात करता है और जनता की आवाज़ को अपनी सुविधा के अनुसार काट-छाँट कर पेश करता है। जब मीडिया अपनी विश्वसनीयता बचाने की कोशिश करता है, तो जनता और ज्यादा नाराज हो जाती है। यह शर्म की स्थिति है। अगर मीडिया अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगा तो विरोध और तेज होगा। आज नहीं तो कल, इन्हीं सवालों के आगे मीडिया को झुकना पड़ेगा।
तीन विरोधों का आपसी रिश्ता
ये तीन विरोध अलग-अलग नहीं हैं। सरकार के खिलाफ गुस्सा जब घर पहुँचता है तो माता-पिता पर सवाल उठते हैं। जब सूचना माध्यम इन सवालों को नजरअंदाज करते हैं तो मीडिया पर भी नाराजगी फूट पड़ती है। यह एक चक्र है। युवा पीढ़ी अब सिर्फ सत्ता से नहीं, बल्कि उन सभी संस्थाओं से सवाल कर रही है जो उनके भविष्य को प्रभावित करती हैं—परिवार, राजनीति और मीडिया।
जंतर मंतर सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि इस समय का आईना बन गया है। वहाँ से निकलने वाली आवाज़ें बता रही हैं कि देश में असंतोष गहरा रहा है। सरकार के खिलाफ विरोध तो चलता रहेगा, लेकिन माता-पिता और मीडिया के खिलाफ उठते सवाल कहीं ज्यादा गहरे हैं। ये सवाल नैतिकता, विश्वास और जवाबदेही से जुड़े हैं। अगर इनका ईमानदार जवाब नहीं दिया गया तो विरोध और फैलता जाएगा।
आज जरूरत है कि सत्ता, परिवार और मीडिया तीनों आत्ममंथन करें। लोकतंत्र सिर्फ सड़क पर नारे लगाने से नहीं चलता। वह सवालों के ईमानदार जवाब देने से चलता है। जंतर मंतर की आवाज़ अगर अनसुनी रह गई तो कल ये सवाल हर घर और हर न्यूजरूम तक पहुँच जाएंगे।
