अपनी दुर्दशा के लिए मीडिया कर्मी स्वयं जिम्मेदार -चाटुकारिता भरी दरबारी पत्रकारिता का मिला प्रतिफल

खरी -खरी
दुःखद – चिन्ताजनक -शर्मनाक पहलू

(कटनी) आज एक बार फ़िर ज़िले के पत्रकारों की अहमियत शासन, प्रशासन की नज़र मे कितनी अहम है उस समय सामने आ गई जब एक राजनीतिक व्यक्ति के कहने पर एक पत्रकार की पत्नी को उस सरकारी अस्पताल में भर्ती किया गया जिस अस्पताल के सामने मीडियाकर्मियों का जमावड़ा सुबह से देर रात तक लगा रहता है । यह स्थिति मिडियाकर्मियों के लिए न केवल सोचनीय है बल्कि शर्मनाक भी है । अभी कुछ दिन पहले तक मीडिया कर्मी वैक्सीन लगवाने के लिए भिखारियों की तरह गुहार लगा रहे थे । वैसे अपने को इन हालातों में पहुंचाने के लिए बहुत हद तक मीडिया कर्मी ख़ुद जिम्मेदार हैं । समाज के अंतिम छोर की आवाज़ बनने वाली पत्रकारिता छोड़कर सुविधाभोगी चाटुकारिता भरी दरबारी पत्रकारिता करने का इससे बढ़िया प्रतिफल और हो भी क्या सकता है? इसके पहले भी कई बार मीडियाकर्मियों के साथ शासन, प्रशासन, राजनीतिक लोगों द्वारा ख़ुद को महिमामण्डित कराने के बाद दूध में पड़ी हुई मरी मक्खी की तरह निकाल कर फेंका जाता रहा है । मग़र हर बार न जाने क्यों मीडियाकर्मी अपने ज़मीर को मारकर इनकी ड्योढ़ी पर माथा टेकने पहुंच जाते हैं? कोरोना काल में भी लगातार मीडियाकर्मियों का स्वास्थ्य ख़राब होने पर उन्हें अस्पताल में समुचित ईलाज के लिए तरसना पड़ता है । वरिष्ठ पत्रकार की पत्नी को बिना किसी सोर्स सिफारिश के अस्पताल प्रबंधन ने भर्ती नहीं किया इसकी जांच की जानी चाहिए और दोषियों को दंडित किये जाने की मांग मीडियाकर्मियों को करनी चाहिए। हां एक बात और आज की घटना ने अस्पताल प्रबंधन की इस घिनौनी सूरत को भी उजागर कर दिया है कि अस्पताल सफ़ेदपोशों की मुठ्ठी में क़ैद है तथा ईलाज के लिए अस्पताल आने वाले आम आदमी के साथ कितना क्रूरता पूर्ण व्यवहार किया जाता होगा ! फ़िर भी किसी ने तो पत्रकार की मदद करने की ज़हमत उठाई उसके लिए साधुवाद वरना कुछ तो अपने जन्मदिन की प्रायोजित बधाई बटोरने में ही व्यस्त और मस्त हैं । पब्लिक जाये भाड़ में।

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार

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