संसाधनों का संयमित उपयोग : सच्ची देशभक्ति की पहचान”… रवींद्र सिंह (मंजू सर)

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(मैहर) आज हमारा भारत देश विकास की नई ऊँचाइयों को छू रहा है। भारत के पास पेट्रोल, डीजल, खाद्य तेल, सोना तथा विदेशी मुद्रा जैसे अनेक महत्वपूर्ण संसाधन उपलब्ध हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि देश संसाधनों की कमी से नहीं, बल्कि उनके उचित प्रबंधन और संतुलित उपयोग की चुनौती से जूझ रहा है। ऐसे समय में प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य बनता है कि वह राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए इन संसाधनों का सोच-समझकर उपयोग करे।

देशभक्ति केवल सीमा पर जाकर युद्ध लड़ने का नाम नहीं है। सच्ची देशभक्ति वह है, जिसमें नागरिक अपने व्यवहार से देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को मजबूत बनाएं।

रवींद्र सिंह (मंजू सर )मैहर की कलम कहती है कि यदि हम अनावश्यक रूप से पेट्रोल-डीजल का अत्यधिक उपयोग करेंगे, खाने के तेल की बर्बादी करेंगे या दिखावे के लिए सोना खरीदेंगे, तो इसका सीधा प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। संसाधनों के संरक्षण और संतुलित उपयोग का महत्व लंबे समय से बताया जाता रहा है।इतिहास गवाह है कि कठिन परिस्थितियों में देशवासियों ने त्याग और संयम का परिचय दिया है।

विभिन्न समयों पर नागरिकों से संसाधनों के सीमित उपयोग और सोने की खरीद कम करने की अपील की जाती रही है ताकि देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव कम हो सके।आज आवश्यकता इस बात की है कि हम “जितनी जरूरत, उतना उपयोग” की भावना अपनाएँ। पानी, बिजली, ईंधन, भोजन और धन — सभी संसाधन राष्ट्र की संपत्ति हैं। यदि हर नागरिक थोड़ा-सा संयम अपनाए, तो देश को आत्मनिर्भर और मजबूत बनने से कोई नहीं रोक सकता।

भारत के इतिहास में कई ऐसे अवसर आए जब देश को आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उस समय सरकारों ने देशवासियों से त्याग, संयम और संसाधनों के सीमित उपयोग की अपील की।कांग्रेस सरकार के समय का सबसे बड़ा उदाहरण वर्ष 1991 का आर्थिक संकट माना जाता है।

रवींद्र सिंह मंजू सर मैहर की कलम कहती है कि वर्ष 1991 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहाराव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधारों की शुरुआत की। देश की स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी थी कि लगभग 67 टन सोना विदेशी बैंकों के पास गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा जुटानी पड़ी। इस घटना से मिलने वाली सीख यह है कि यदि देश के संसाधनों का संतुलित उपयोग न किया जाए, तो राष्ट्र को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। उस समय सरकार ने जनता से फिजूलखर्ची कम करने और आयातित वस्तुओं के उपयोग को सीमित करने की अपील की थी।

आज भारत विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है, लेकिन 1991 का वह दौर हमें यह याद दिलाता है कि संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग और मजबूत आर्थिक प्रबंधन कितना आवश्यक है।नागरिकों का यह कर्तव्य है कि वे पेट्रोल, डीजल, खाद्य तेल, सोना और अन्य संसाधनों का अनावश्यक उपयोग न करें। राष्ट्रहित में किया गया छोटा-सा त्याग भी देश की आर्थिक मजबूती में बड़ा योगदान दे सकता है।

अंत में यही कहा जा सकता है कि देशप्रेम केवल नारों से नहीं, बल्कि जिम्मेदार व्यवहार से सिद्ध होता है। संसाधनों का संरक्षण और उनका विवेकपूर्ण उपयोग ही सच्चे नागरिक की पहचान है। राष्ट्रहित में किया गया छोटा-सा त्याग भी आने वाली पीढ़ियों के लिए उज्ज्वल भविष्य का आधार बन सकता है।

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