कटनी जिले के ग्राम कलहरा में लगता है भूमिकेश्वर धाम का प्राचीन मेला
प्रशासनिक एवम राजनैतिक जागरूकता के अभाव में अपने अस्तित्व को खोता जा है प्राचीन मेला
(विजयराघवगढ़) विजयराघवगढ़ ऐतिहासिक क्षेत्र मे पौराणिक काल की अद्भुत एवम प्राकृतिक जलकुंड से सुशोभित स्थल भूमिकेश्वर धाम क्षेत्र एवम जिले की धार्मिक आस्था का प्राचीन ऋषि भोंडसनाथ की तपोभूमि माना जाता है। यह स्थल विजयराघवगढ़ से पश्चिम दिशा में 4 किलोमीटरकी दूरी पर स्थित है। यहां प्राचीन काल से प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति 14 जनवरी से 20 जनवरी तक मेला भरता है। पाठ्यक्रम में जबलपुर जिले के दो महत्वपूर्ण मेले एक जबलपुर भेड़ाघाट का मेला और दूसरा विजयराघवगढ़ के भूमिकेश्वर मेले को पढ़ाया जाता था।
विजयराघवगढ़ के इस प्राचीन एवं धार्मिक आस्था की अद्भुत जलकुंडो के इतिहास पर नजर डाली जाए तो इस जगह को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम जी के द्वारा स्थापित किया जाना माना जाता है तथा चमत्कारी ऋषि भोंडासनाथ की तपोभूमि माना जाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम, लक्ष्मण , सीता समेत जब चित्रकूट से दंडक वन जा रहे थे, उस समय जब वे विंध्य पर्वत को पार किया, और भोंडस नाथ के आश्रम पर आए तब महर्षि भोंडस नाथ जी ने प्राकृतिक जलकुंड के अंदर भगवान शिव की अर्धनारीश्वर रूप में स्थापना कराई थी और इस मनोरम जगह को भूमिकेश्वर धाम का नाम रखा था, तभी से यहां प्रति वर्ष मकर संक्रांति पर विशाल मेला भरता है।
विजयराघवगढ़ रियासत के प्रतापी महाराज प्रयागदास जी ने जिन्होंने श्री राम जी के वन मार्ग की सबसे पहले खोज की थी , उन्होंने इस स्थल पर घाट व अनेक मंदिरों के निर्माण के साथ यहां मेले की परंपरा की शुरुआत की थी।
महान साहित्यकार ठाकुर जगमोहन सिंह जी ने अपने सुप्रसिद्ध उपन्यास में इस क्षेत्र में श्री राम सीता वा लक्ष्मण के पावन चरण रज से विभूषित बताया है।यथा
“या ही मग ह्वै के गए दंडक वन किश्री राम ।
ताशो पावन देश यह विंध्याटवी लताम । श्यामा श्वप्न उपन्यास ।
विजयराघवगढ़ व कटनी जिले की धार्मिक आस्था में यह गौरव की बात है कि अपने वनवास काल में मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम सीता लक्ष्मण समेत विंध्याचल पर्वत को पार करके दंडक वन गए है किंतु आज यह स्थल वा प्राचीन मेला प्रशासनिक तथा राजनैतिक जागरूकता के अभाव में अपने अस्तित्व को खोता जा रहे है।
