“ईर्ष्या की ज्वाला से मुक्त होकर सुखमय जीवन जिए”, ईर्ष्या – एक मनोवैज्ञानिक विकार …..!
(मैहर) ईर्ष्या की ज्वाला से मुक्त होकर सुखमय जीवन जिए।ईर्ष्या एक नकारात्मक भावना है जो अहंकार से उत्पन्न होती है।जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को मान सम्मान सफलता प्राप्त करते हुए देखता है और स्वयं उस स्तर तक नहीं पहुंच पाता, तो उसके मन में ईर्ष्या की भावना पनपने लगती है।
अहंकार का कुप्रभाव
अहंकारी व्यक्ति खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझता है। जब वे किसी अन्य व्यक्ति को सफल होते हुए देखते हैं, तो उन्हें हताशा और जलन का अनुभव होता है। वे दूसरों की बुराई की कामना करते हैं, झूठ का जाल बिछाकर लोगो को भ्रमित करते है जबकि अपनी कमियों को स्वीकार करने में असमर्थ होते हैं। रवींद्र सिंह (मंजू सर )मैहर की कलम कहती है कि यह ईर्ष्या की आग धीरे-धीरे उन्हें अंदर से जलाकर खा जाती है।
ईर्ष्या – क्रोध का रूप
ईर्ष्या क्रोध का एक रूप है जो सफल व्यक्ति की बुराई करने की प्रवृत्ति रखता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति भले ही सीधे तौर पर कुछ न कर पाए, लेकिन उनकी नकारात्मक भावनाएं छिप नहीं पातीं और किसी न किसी रूप में प्रकट हो ही जाती हैं।
नकारात्मक परिणाम
ईर्ष्यालु व्यक्ति अनावश्यक चिंता, भय, भ्रम और घबराहट से ग्रस्त रहते हैं। वे हमेशा किसी न किसी रूप में परेशान रहते हैं और सुख-शांति का अनुभव नहीं कर पाते।
सफलता का मार्ग
रवींद्र सिंह (मंजू सर )मैहर की कलम कहती है कि ईर्ष्या से मुक्त होने का सबसे अच्छा तरीका है कि हम सफल व्यक्ति की सराहना करें और उनसे प्रेरणा लें कि आखिर वह इतना नाम सम्मान कैसे प्राप्त किया।।कही उसके पीछे उसका कार्य के प्रति समर्पण तो नही था। हमें अपनी मेहनत और क्षमता पर विश्वास रखते हुए आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। तभी हम सच्चा सुख और सफलता प्राप्त कर पाएंगे।
