“वैराग्य की ओर बढ़ता मन: अनुभवों से जन्मी चुप्पी”…रवींद्र सिंह (मंजू सर)
(मैहर) मनुष्य का स्वभाव प्रारम्भ में बहुत कोमल और अपेक्षाओं से भरा होता है। वह रिश्तों से आशा रखता है, अपनों से समझे जाने की इच्छा करता है, और जब बात न बने तो शिकायत करता है, मनाता है, मिन्नतें करता है। लेकिन एक समय ऐसा आता है जब लगातार ठोकरें, उपेक्षा और स्वार्थ से भरे व्यवहार उसके भीतर कुछ बदल देते हैं।धीरे-धीरे वह समझ जाता है कि हर किसी से अपनी भावनाओं का सम्मान पाने की उम्मीद करना व्यर्थ है।
रवींद्र सिंह मंजू सर मैहर की कलम कहती है कि दुनिया में अधिकांश लोग अपने स्वार्थ, सुविधा और परिस्थितियों के अनुसार ही संबंध निभाते हैं। यह अनुभव मन को कठोर नहीं बनाता, बल्कि उसे शांत और तटस्थ बना देता है। तब व्यक्ति शिकायत करना छोड़ देता है। उसे मनाने या मनवाने की इच्छा नहीं रहती। वह यह स्वीकार कर लेता है कि जो उसके साथ रहना चाहता है, वह बिना आग्रह के रहेगा; और जो नहीं रहना चाहता, उसे रोकना भी व्यर्थ है।
ऐसे उदाहरण के साथ इस आकलन के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है मान लीजिए, एक युवक हरि अपने मित्रों के प्रति अत्यंत समर्पित था। वह हर सुख-दुख में साथ खड़ा रहता, उनकी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखता। लेकिन जब उसे स्वयं कठिन समय का सामना करना पड़ा, तो वही मित्र व्यस्तता और बहानों में उलझ गए। हरि ने पहले शिकायत की, फिर समझाने की कोशिश की, फिर संबंधों को बचाने के लिए प्रयास किए। परंतु जब उसे बार-बार निराशा ही मिली, तब उसने एक दिन चुप रहना सीख लिया। उसने किसी से कुछ कहना बंद कर दिया। अब यदि कोई मित्र उससे बात करता, तो वह सामान्य व्यवहार करता; और यदि कोई न करता, तो भी वह भीतर से विचलित नहीं होता। उसने अपना ध्यान परमात्मा एवं आत्मसम्मान पर केंद्रित कर लिया।यह परिवर्तन क्रोध से नहीं, बल्कि अनुभव से जन्मा था। वह समझ चुका था कि संबंधों में जबरन उपस्थिति नहीं कराई जा सकती।
रवींद्र सिंह मंजू सर मैहर की कलम कहती है कि सच्चे संबंध स्वयं टिकते हैं; उन्हें बार-बार सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती। जब मनुष्य इस अवस्था में पहुँचता है, तो वह नकारात्मक नहीं होता, बल्कि परिपक्व हो जाता है। वह अपेक्षाओं का बोझ उतार देता है। शिकायतों का अंत, शांति की शुरुआत बन जाता है।इस स्थिति में व्यक्ति का हृदय ऐसा हो जाता है कि किसी का साथ मिले तो आभार, और न मिले तो भी कोई पीड़ा नहीं। वह आत्मनिर्भर भाव से जीना सीख लेता है। उसे यह बोध हो जाता है कि संसार की अस्थिरता ही उसका स्वभाव है।अंततः यह चुप्पी हार की नहीं, बल्कि आत्मज्ञान की निशानी है। यह उस क्षण का प्रतीक है जब इंसान दूसरों को बदलने की कोशिश छोड़कर स्वयं को संभालना सीख लेता है। और यही परिपक्वता जीवन को संतुलित और शांत बनाती है।
