सुख-दुख दोनो ही मनुष्य की अनुभूति का परिणाम है: पं सुरेन्द्र दुबे
स्वजन प्रणाम
सुविचार
मानव जीवन में सुख और दुख दोनों का मिश्रण होता है। सुख की अवस्था में मनुष्य उसके मद में उन्मुक्त रहता है तो दुख की जरा सी दस्तक के बाद उसके कारणों को विवेचना में जुट जाता है।
यह सच है कि सुख-दुख एक सिक्के के दो पहलू है। दोनो ही मनुष्य की अनुभूति का परिणाम है। प्राय: अनुकूलता में सुख और प्रतिकूलताओं में दुख महसूस करना मनुष्य का स्वभाव है। यूं तो अधिकांश मनुष्य ‘सुख ‘ की आकांक्षा करते हैं, लेकिन यह भी सही है कि दुख के अस्तित्व से ही सुख की अनुभूति हो पाती है।
वास्तव में ये जीवन के दुख ही है जो व्यक्ति के पैर जमीन पर टिकाए रखते हैं। दुख की स्थिति में ही मनुष्य संघर्ष के लिए नए सिरे से तैयार होकर सुख प्राप्ति के उपक्रम में संलग्न हो जाता है। हम जीवन से दुःखी हैं, क्योंकि हम अपनी ‘उम्मीदों’ के शिकार हैं।
हमें अपनी उम्मीदों से बाहर निकलने की ‘कला’ सीखनी होगी,क्योंकि दूसरों से अत्यधिक उम्मीदों के कारण से हम दुःख झेलते हैं। हम अपनी ‘बुद्धि’ पर भरोसा नहीं करते, परन्तु उम्मीदों पर अधिक ‘भरोसा’ करते हैं। इसलिए, ‘सुखी’ रहने के लिए इससे बचना चाहिए।
🙏🏾जय हिन्द 🙏🏾
पं सुरेन्द्र दुबे, विजयराघवगढ़

