स्वर्ग और नरक कहीं अन्यत्र नहीं, हमारे “विचारों” में ही है: पंडित सुरेन्द्र दुबे

स्वजन प्रणाम
सुविचार

मनुष्य विचारों की कठपुतली है। हमारे मन-मस्तिष्क में जैसे विचार आते और स्थापित होते हैं, हम वैसा व्यवहार करने लगते हैं। आदर्श रूप में हमारे विचारों में शुद्घता या पवित्रता होनी चाहिए। विचार शुद्ध होंगे तो हमारा व्यवहार भी सकारात्मक होगा।

हमारे मन में अच्छे-बुरे सकारात्मक/नकारात्मक दोनों तरह के विचार आते-जाते रहते हैं और हमारा मन विचारों के मकड़जाल में भटकता रहता है।जिस कारण हम अमूमन अच्छे विचार को त्याग देते हैं और नकारात्मकता को ग्रहण कर लेते हैं। जब प्राथमिक स्तर पर हमसे गलती हो जाती है तो हम फिर आगे गलत ही व्यवहार करते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके विचारों पर ही निर्भर करता है। अच्छे विचार व्यक्ति को विकास के पथ पर अग्रसर करते हैं। मनुष्य का आचरण ही उसे पहचान देता है और ऐसा आचरण सुविचारों से ही संचालित होता है। जिस तरह के विचार हमारे मन-मस्तिष्क में उत्पन्न होतो हैं, हमारे कर्म भी उसी के अनुसार होते हैं।

अपने आचार-विचार और व्यवहार को उच्च वनाने के बाद ही मानव को वास्तविक सुख-शांति की प्राप्ति होती है। क्योंकि मनुष्य की साकारात्मक और नकारात्मक सोच ही उसे शुभ-अशुभ कार्यों के लिए प्रेरित करती है,
इसलिए मनुष्य के जैसे “विचार” होते हैं, वैसा ही उसका “जीवन” बनता है।
यह समझना आवश्यक है कि स्वर्ग और नरक कहीं अन्यत्र नहीं,हमारे”विचारों” में ही है।

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