पत्रकारिता- आईना, जो कभी नहीं झूठ बोलता : हरि शंकर पाराशर
30 मई, हिंदी पत्रकारिता दिवस
कटनी। 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। ठीक 197 साल पहले कलकत्ता से उदंत मार्तंड निकला था – भारत की पहली हिंदी पत्रिका। उस दिन पत्रकारिता ने हिंदी में अपनी आवाज पाई। लेकिन आज जब हम इस दिवस को मना रहे हैं, तो सवाल यह नहीं है कि हम कितने उत्सव मनाएं, बल्कि यह कि पत्रकारिता अब खुद को कितना आईना बना पा रही है – वह आईना जो समाज का सच्चा चेहरा दिखाए, न कि वह चेहरा जो मालिक या भीड़ चाहे।
अतीत: बलिदान की जड़ें
पत्रकारिता का भूतकाल गौरवशाली है, लेकिन आरामदेह नहीं। राजा राममोहन राय, बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस – ये नाम सिर्फ स्वतंत्रता सेनानी नहीं, पत्रकार भी थे। उन्होंने कलम को तलवार से ज्यादा तेज माना। 1975 की इमरजेंसी में जब अखबारों पर सेंसरशिप लगी, तब भी कुछ संपादकों ने खाली जगह छोड़कर विरोध दर्ज किया।
हिंदी पत्रकारिता ने गांव-कस्बों तक लोकतंत्र की चिंगारी पहुंचाई। लेकिन यह भी सच है कि यह अक्सर सत्ता के करीब रहकर भी सत्ता से लड़ती रही। यह विरोधाभास ही उसकी शक्ति था।
वर्तमान: आईने का टूटना
आज पत्रकारिता एक अजीब मोड़ पर खड़ी है। सच तो यह है कि हमने कभी इतनी “खबरें” नहीं देखीं, जितनी आज देख रहे हैं। और शायद कभी इतना कम सत्य भी नहीं देखा। टीआरपी, क्लिक-बेट, राजनीतिक आकांक्षा और कॉरपोरेट मालिकाना हक ने समाचार को माल में बदल दिया है।
कुछ चैनल और वेबसाइट्स अब समाचार नहीं, नरेटिव बेचते हैं। एक तरफ जहां सोशल मीडिया ने आम आदमी को पत्रकार बना दिया, वहीं उसी ने अफवाह को भी पंख दे दिए। फेक न्यूज अब इतनी परिष्कृत हो गई है कि सच्ची खबर को भी संदिग्ध बना देती है।
हिंदी पत्रकारिता का वर्तमान और भी चुनौतीपूर्ण है। अंग्रेजी मीडिया की तुलना में संसाधन कम, जिम्मेदारी ज्यादा। गांव की खबर अब शहर के स्टूडियो में बैठकर बनाई जाती है। पत्रकार थक चुका है – कम वेतन, जान की धमकी, ट्रोल आर्मी और एडिटर की “लाइन” के बीच फंसा हुआ।
फिर भी, कुछ पत्रकार अभी भी मैदान में हैं। जिन्हें न तो ब्रेकिंग न्यूज की चकाचौंध चाहिए, न ही वायरल होने की भूख। वे सिर्फ सच लिखते हैं। यही हमारे उदंत मार्तंड के वास्तविक वारिस हैं।
भविष्य: या तो गहरा अंधेरा, या नया उजाला
अगले दस-पंद्रह साल में पत्रकारिता दो रास्तों पर जा सकती है।
पहला रास्ता: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डीपफेक और एल्गोरिदम-नियंत्रित दुनिया जहां “सच” व्यक्ति विशेष या कंपनी का उत्पाद बन जाएगा। जहां पत्रकार की जगह रोबोट न्यूज रीडर और चैटबॉट ले लेंगे। जहां भावनाएं बेचना ही सबसे बड़ा बिजनेस होगा।
दूसरा रास्ता: वह जहां पत्रकारिता अपनी जड़ों में लौटे। जहां सत्य की तह तक जाने की हिम्मत हो। जहां डेटा जर्नलिज्म, इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग और मानवीय संवेदना का नया मेल हो। जहां हिंदी पत्रकारिता सिर्फ दिल्ली-मुंबई तक सीमित न रहे, बल्कि छोटे शहरों और गांवों से उभरने वाली सच्ची कहानियों का वाहक बने।
भविष्य में पत्रकार को अब सिर्फ खबर लिखने वाला नहीं, बल्कि सत्य का रक्षक, संदेह का विश्लेषक और नैतिकता का प्रहरी बनना होगा।
अंत में:
पत्रकारिता कोई पेशा नहीं, एक मिशन है। यह समाज का वह आईना है जो कभी-कभी कुरूपता दिखाता है, तो कभी आशा भी जगाता है।
30 मई का यह दिवस हमें याद दिलाता है कि उदंत मार्तंड सिर्फ एक अखबार नहीं था, एक विचार था – कि आम आदमी को भी अपनी भाषा में सत्य जानने का अधिकार है।
जब तक यह विचार जिंदा है, पत्रकारिता मरेगी नहीं।
चाहे कितने भी मालिक आएं, कितने भी एल्गोरिदम आएं, कितनी भी ट्रोल आर्मी आए।
सच्चा पत्रकार वही है जो आईने को साफ रखता है – भले ही उसमें उसका अपना चेहरा कितना भी टूटा दिखे।
✍️ हरि शंकर पाराशर
RPKP INDIA NEWS
कटनी
