पानी की लड़ाई में क्यों घुला जातिवाद? पानी की मांग जायज़ है, लेकिन किसी अधिकारी का मूल्यांकन उसकी जाति से नहीं, उसके कार्यों से होना चाहिए – डॉ. प्रियंका सौरभ

पानी की मांग जायज़ है, लेकिन किसी अधिकारी का मूल्यांकन उसकी जाति से नहीं, उसके कार्यों से होना चाहिए – डॉ. प्रियंका सौरभ

(हिसार/ हरियाणा) हरियाणा के हांसी क्षेत्र के चैनत गाँव में पानी की समस्या को लेकर चल रहा आंदोलन एक महत्वपूर्ण सामाजिक और प्रशासनिक प्रश्न को सामने लाता है। किसी भी नागरिक समाज में पीने के पानी जैसी मूलभूत आवश्यकता के लिए लोगों को सड़क पर उतरना पड़े, यह अपने आप में शासन व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। पानी केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। इसलिए चैनत के ग्रामीणों द्वारा अपनी समस्या को लेकर आवाज उठाना पूरी तरह न्यायसंगत और लोकतांत्रिक अधिकारों के अनुरूप है। किंतु इसी आंदोलन के दौरान कुछ ऐसी टिप्पणियाँ सामने आईं, जिनमें एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के प्रति व्यक्तिगत और जातिगत आधार पर अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया। यह स्थिति हमें सोचने पर विवश करती है कि क्या किसी जायज़ मांग को मनवाने के लिए सामाजिक मर्यादा और संवैधानिक मूल्यों की सीमाएँ लांघी जा सकती हैं?

भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अनेक अवसरों पर स्पष्ट किया है कि जीवन के अधिकार में स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता भी शामिल है। यदि किसी गाँव में लोग पर्याप्त पानी से वंचित हैं, तो यह केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों और प्रशासनिक उत्तरदायित्व का विषय है। ग्रामीणों की पीड़ा वास्तविक है और उसका समाधान करना सरकार तथा प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। जल संकट केवल असुविधा नहीं पैदा करता, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। महिलाओं और बच्चों को अक्सर पानी की व्यवस्था के लिए अतिरिक्त श्रम करना पड़ता है, जिससे उनकी दिनचर्या और अवसर प्रभावित होते हैं।

भारत जैसे देश में जल संकट की समस्या नई नहीं है। बढ़ती जनसंख्या, भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन, वर्षा के असमान वितरण, जल स्रोतों के संरक्षण की कमी और अव्यवस्थित शहरीकरण ने अनेक क्षेत्रों में जल संकट को गंभीर बनाया है। हरियाणा जैसे कृषि प्रधान राज्य में यह चुनौती और भी बड़ी हो जाती है क्योंकि कृषि, घरेलू उपयोग और औद्योगिक आवश्यकताओं के बीच जल संसाधनों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में यदि किसी गाँव के लोग अपनी समस्या को लेकर आंदोलन कर रहे हैं, तो उनकी बात सुनना और समाधान निकालना प्रशासन का दायित्व है।

लोकतंत्र में विरोध और आंदोलन नागरिकों का वैध अधिकार है। जब जनता को लगता है कि उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा, तब वे ज्ञापन देते हैं, धरना-प्रदर्शन करते हैं और प्रशासन का ध्यान आकर्षित करते हैं। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक स्वस्थ प्रक्रिया है। लेकिन लोकतंत्र केवल अधिकारों का नाम नहीं है, यह जिम्मेदारियों का भी नाम है। विरोध का अधिकार उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि सामाजिक मर्यादा और पारस्परिक सम्मान बनाए रखना। यदि आंदोलन के दौरान भाषा की गरिमा समाप्त हो जाए और व्यक्तिगत या जातिगत टिप्पणियाँ होने लगें, तो आंदोलन का नैतिक आधार कमजोर पड़ जाता है।

किसी अधिकारी, जनप्रतिनिधि या सार्वजनिक व्यक्ति की आलोचना करना लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन आलोचना का आधार उसके निर्णय, कार्यशैली और नीतियाँ होनी चाहिए। जब आलोचना व्यक्ति की जाति, पहनावे, भाषा या सामाजिक पृष्ठभूमि पर केंद्रित हो जाती है, तब वह लोकतांत्रिक विमर्श नहीं रह जाती, बल्कि पूर्वाग्रह और भेदभाव का रूप ले लेती है। यह स्थिति न केवल संबंधित व्यक्ति को आहत करती है, बल्कि समाज में विभाजन और अविश्वास को भी बढ़ावा देती है।

भारतीय संविधान की मूल भावना समानता पर आधारित है। संविधान निर्माताओं ने एक ऐसे समाज की कल्पना की थी जहाँ किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी जाति, धर्म, भाषा या जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी योग्यता और कर्म के आधार पर किया जाए। इसी उद्देश्य से संविधान में समानता का अधिकार दिया गया तथा अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव को समाप्त करने के लिए विशेष प्रावधान किए गए। इसके बावजूद आज भी समाज के अनेक हिस्सों में जातिगत सोच और पूर्वाग्रह मौजूद हैं। जब किसी अधिकारी या व्यक्ति के बारे में उसकी जाति के आधार पर टिप्पणी की जाती है, तो यह केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं होता, बल्कि संविधान की मूल भावना का भी अनादर होता है।

यह समझना आवश्यक है कि किसी भी प्रशासनिक पद तक पहुँचने के पीछे वर्षों का कठिन परिश्रम और संघर्ष होता है। भारतीय प्रशासनिक सेवा, राज्य प्रशासनिक सेवा या अन्य उच्च पदों पर चयनित होने वाले अधिकारी लंबी प्रतियोगी प्रक्रिया से गुजरते हैं। वे कठिन परीक्षाएँ उत्तीर्ण करते हैं, प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं और सार्वजनिक सेवा के लिए स्वयं को तैयार करते हैं। इसलिए किसी अधिकारी का मूल्यांकन उसके सामाजिक या जातिगत परिचय से नहीं, बल्कि उसके कार्य और प्रदर्शन से होना चाहिए।

सार्वजनिक जीवन में गरिमा का महत्व अत्यंत बड़ा है। यदि समाज में यह प्रवृत्ति बढ़ने लगे कि किसी व्यक्ति की आलोचना उसके जन्मगत आधारों पर की जाए, तो इससे लोकतांत्रिक संवाद की गुणवत्ता प्रभावित होती है। ऐसी स्थिति में योग्य और प्रतिभाशाली लोग भी सार्वजनिक जीवन में आने से हिचक सकते हैं। इससे प्रशासनिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास भी कमजोर पड़ सकता है।

यह भी उतना ही सत्य है कि प्रशासन को जनता की भावनाओं और समस्याओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। कई बार समस्याओं के समाधान में देरी या संवाद की कमी के कारण लोगों में असंतोष बढ़ता है। इसलिए प्रशासन की जिम्मेदारी केवल आदेश जारी करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसे लोगों से संवाद स्थापित करना चाहिए, उनकी शिकायतों को सुनना चाहिए और समाधान की दिशा में पारदर्शी प्रयास करने चाहिए। यदि ग्रामीणों को यह महसूस होगा कि उनकी बात सुनी जा रही है और समाधान के लिए ईमानदार प्रयास हो रहे हैं, तो तनाव और टकराव की स्थिति भी कम होगी।

चैनत के मामले में भी आवश्यक है कि प्रशासन और ग्रामीण आमने-सामने खड़े होने के बजाय संवाद की प्रक्रिया को मजबूत करें। जल संकट जैसी समस्या का समाधान केवल आरोप-प्रत्यारोप से नहीं निकल सकता। इसके लिए प्रशासनिक इच्छाशक्ति, तकनीकी योजना और सामुदायिक सहभागिता की आवश्यकता है। तत्काल राहत के रूप में जल टैंकरों की व्यवस्था, अतिरिक्त जल आपूर्ति और अस्थायी समाधान किए जा सकते हैं। लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए जल स्रोतों का संरक्षण, वर्षा जल संचयन, पाइपलाइन नेटवर्क का विस्तार, जल भंडारण क्षमता में वृद्धि और भूजल पुनर्भरण जैसे उपाय आवश्यक हैं।

ग्रामीण समुदाय की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। जल संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। समाज को भी जल के विवेकपूर्ण उपयोग, वर्षा जल संचयन और स्थानीय जल स्रोतों के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। यदि समुदाय और प्रशासन मिलकर काम करें, तो जल संकट जैसी समस्याओं का स्थायी समाधान संभव है।

शिक्षा और सामाजिक जागरूकता भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और मीडिया को ऐसी सोच विकसित करनी चाहिए जो समानता, सम्मान और संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा दे। जातिगत पूर्वाग्रहों को समाप्त करने के लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं हैं; इसके लिए सामाजिक चेतना का विकास भी आवश्यक है। जब तक समाज के भीतर मानसिक परिवर्तन नहीं होगा, तब तक समानता के संवैधानिक आदर्श पूरी तरह साकार नहीं हो पाएंगे।

यदि किसी सार्वजनिक मंच पर जातिगत या अपमानजनक टिप्पणी की गई है, तो उसका समाधान भी संवैधानिक और कानूनी दायरे में होना चाहिए। लोकतंत्र में कानून का शासन सर्वोपरि है। किसी भी प्रकार के भेदभावपूर्ण या अपमानजनक व्यवहार को स्वीकार नहीं किया जा सकता। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ऐसी घटनाओं का उपयोग मूल समस्या से ध्यान भटकाने के लिए न हो। पानी का संकट वास्तविक है और उसका समाधान प्राथमिकता के आधार पर होना चाहिए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि चैनत के आंदोलन को उसके मूल उद्देश्य से जोड़ा जाए। आंदोलन का लक्ष्य पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना होना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति या समुदाय के प्रति घृणा का वातावरण बनाना। ग्रामीणों की मांग जायज़ है और उन्हें न्याय मिलना चाहिए। वहीं सामाजिक मर्यादा और संवैधानिक मूल्यों का पालन भी उतना ही आवश्यक है।

अंततः चैनत की घटना हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देती है। लोकतंत्र में अधिकारों की रक्षा और सामाजिक सम्मान, दोनों साथ-साथ चलते हैं। नागरिकों को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए आवाज उठाने का पूरा अधिकार है, लेकिन यह आवाज ऐसी होनी चाहिए जो संवाद और समाधान का मार्ग प्रशस्त करे, न कि विभाजन और वैमनस्य का। पानी हर नागरिक का अधिकार है और सम्मान हर व्यक्ति की गरिमा का आधार। यदि हम इन दोनों मूल्यों की रक्षा कर सकें, तभी हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर पाएंगे जो न्यायपूर्ण, संवेदनशील और वास्तव में लोकतांत्रिक हो।

पानी की समस्या का समाधान प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन जातिवाद का समाधान पूरे समाज की जिम्मेदारी है। यही चैनत की घटना का सबसे बड़ा सबक है।

(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

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