करोड़ों का हाई स्कूल भवन या भ्रष्टाचार की नींव बुजबुजा में निर्माण कार्य पर उठे गंभीर सवाल, शिकायतों के बाद भी मौन विभाग

ग्रामीणों का आरोप घटिया सामग्री से हो रहा निर्माण, नाबालिग से कराई जा रही मजदूरी इंजीनियर गायब और जांच सिर्फ कागजों तक सीमित

(बरही) प्रदेश सरकार ग्रामीण क्षेत्रों के विकास और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। गांव-गांव आधुनिक स्कूल भवन, सड़कें नालियां, अस्पताल और सामुदायिक भवन बनाए जा रहे हैं, ताकि ग्रामीणों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें और बच्चों को शिक्षा के लिए गांव छोड़कर दूसरे शहरों का रुख न करना पड़े। लेकिन जब इन्हीं योजनाओं की निगरानी करने वाले जिम्मेदार अधिकारी अपनी जिम्मेदारी भूल जाएं और निर्माण एजेंसियों पर लग रहे आरोपों की निष्पक्ष जांच तक न हो, तब सरकारी खजाने से खर्च होने वाला करोड़ों रुपये जनता के लिए नहीं बल्कि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने लगता है।

ऐसा ही मामला कटनी जिले के जनपद पंचायत बड़वारा अंतर्गत ग्राम पंचायत बुजबुजा में सामने आया है। यहां लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के माध्यम से करोड़ों रुपये की लागत से हाई स्कूल भवन का निर्माण कराया जा रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण कार्य कई महीनों से कछुए की चाल से चल रहा है और गुणवत्ता को ताक पर रखकर भवन तैयार किया जा रहा है।

ग्रामीणों के अनुसार भवन निर्माण में सीमेंट की मात्रा निर्धारित मानकों से कम उपयोग की जा रही है। कई स्थानों पर डस्ट से चिनाई कराई गई है, रेत का अनुपात भी कम रखा जा रहा है तथा स्थानीय स्तर के मजदूरों और मिस्त्रियों से बिना पर्याप्त तकनीकी निगरानी के काम कराया जा रहा है। लोगों का कहना है कि यदि अभी गुणवत्ता की जांच नहीं हुई तो भविष्य में यह भवन विद्यार्थियों के लिए खतरा बन सकता है।

मामले का सबसे गंभीर आरोप यह है कि निर्माण स्थल पर एक नाबालिग बच्चे से भी मजदूरी कराई जा रही है। यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है तो यह बाल श्रम कानूनों के साथ-साथ सरकारी निर्माण कार्यों से जुड़े नियमों का भी गंभीर उल्लंघन होगा।

ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण कार्य शुरू होने के बाद से लगातार शिकायतें की गईं। कई समाचार पत्रों और मीडिया संस्थानों ने भी कथित अनियमितताओं को प्रमुखता से प्रकाशित किया, लेकिन आज तक न तो किसी निष्पक्ष तकनीकी जांच की रिपोर्ट सामने आई और न ही किसी अधिकारी या ठेकेदार के विरुद्ध कार्रवाई हुई।

ग्रामीण आरोप लगाते हैं कि विभागीय अधिकारी जब कभी निरीक्षण के लिए आते भी हैं तो ठेकेदार के साथ औपचारिक निरीक्षण कर वापस लौट जाते हैं। न तो निर्माण सामग्री के नमूने लिए जाते हैं और न ही ग्रामीणों की शिकायतों को मौके पर गंभीरता से सुना जाता है।

सबसे बड़ा सवाल विभागीय निगरानी पर खड़ा हो रहा है। लोक निर्माण विभाग के निर्माण कार्यों में इंजीनियर की नियमित उपस्थिति और गुणवत्ता परीक्षण अनिवार्य माना जाता है, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण स्थल पर न तो इंजीनियर नियमित रूप से मौजूद रहते हैं और न ही कोई परीक्षण लैब या गुणवत्ता जांच की व्यवस्था दिखाई देती है। ऐसे में करोड़ों रुपये के निर्माण कार्य की गुणवत्ता का प्रमाण कौन देगा?

अब सवाल केवल एक भवन का नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही का है। यदि ग्रामीणों के आरोप सही हैं तो यह सिर्फ घटिया निर्माण का मामला नहीं बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग और निगरानी व्यवस्था की गंभीर विफलता का विषय है। आखिर शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई? जिम्मेदार अधिकारियों ने अब तक क्या जांच की? यदि सब कुछ मानकों के अनुरूप है तो स्वतंत्र तकनीकी जांच कराने में हिचकिचाहट क्यों है?

ग्रामीणों ने जिला प्रशासन, लोक निर्माण विभाग के प्रमुख अभियंता तथा प्रदेश सरकार से मांग की है कि हाई स्कूल भवन की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच कराई जाए, निर्माण सामग्री की प्रयोगशाला में जांच हो, बाल श्रम के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा यदि किसी भी स्तर पर अनियमितता सिद्ध होती है तो संबंधित ठेकेदार और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।

अब निगाहें प्रशासन पर हैं ,क्या करोड़ों रुपये से बन रहे इस स्कूल की सच्चाई सामने आएगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
✍️ नीरज तिवारी
RPKP INDIA NEWS
          बरही

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