मातृ दिवस पर विशेष – मां के चरणों में ही स्वर्ग है….।

(भोपाल) जैसा कि सर्व विदित है कि सनातन धर्म के अनुसार प्रत्येक कार्य के शुभारंभ करने के अवसर पर पूजा अर्चना की जाती है। पूजन के दौरान आपने सुना होगा कि –
“त्वमेव माता च पिता त्वमेव,
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविड़म त्वमेव,
त्वमेव सर्वम मम देव देव।।”
उपरोक्त श्लोक में सर्वप्रथम ईश्वर की वंदना माँ के रुप मे की गई है, इसके बाद पिता, भाई एवं मित्र के रुप में। इससे यह स्पष्ट है कि मां का दर्जा सबसे प्रथम और सबसे ऊपर है। मां अपने बच्चे को नौ महीने अपने गर्भ मे पालन पोषण करने के बाद जन्म देती है उसके लिए उसे कितना त्याग करना होता है इसका अंदाजा लगा पाना नामुमकिन ही नही असम्भव है। बच्चे को जन्म देने के बाद उसका लालन पालन में मां की ममता और त्याग अविस्मरनीय है। मां अपने बच्चों की खुशी के लिए अपने सुखो को न्यौछावर कर देती है। मां बच्चों की प्रथम शिक्षक भी होती है। माँ अपने बच्चों से बिना शर्त प्यार करती है और जीवन में सही रास्ते पर उनका मार्गदर्शन करते हुए उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करती है। माँ जीवन भर अपने बच्चे के लिए समर्पित रहती है। एक माँ के बलिदान की गहराई को मापना किसी के लिए भी संभव नहीं है और न ही हम अपनी माँ के अमूल्य एहसान और प्यार को चुका सकते हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी माता की देखभाल करते हुए उनको सम्मान और प्यार दे।

माँ के चरणों में सादर समर्पित

 मांगने पर जहां पूरी हर मन्नत होती है,
मां के पैरों में ही तो वो जन्नत होती है।

रब हर एक मां को सलामत रखना,
वरना हमारे लिए दिल से दुआ कौन करेगा
क्योंकि मां की दुआ वक्त तो क्या नसीब भी बदल देती है।

मां-बाप का दिल जीत लोगे तो कामयाब हो जाओगे,
वरना सारी दुनिया जीत कर भी हार जाओगे।

                                                       

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