पनप रहे गुटबाजी के जकड़न रूपी जहर पर एक चिंतन
क्या आज लोग “गुट” की राजनीति में जकड़ते जा रहे है…? शायद…!
(मैहर) आज राजनीति में एक पार्टी के कई गुट बाजी देखने को प्राप्त होती है चाहे वह भाजपा हो अथवा कांग्रेस अथवा अन्य पार्टियां, सभी में गुट बाजी देखने का पारदुभाव प्राप्त होता है। वह इस नेता के गुट का है वह इस नेता के गुट का यह शीर्ष नेतृत्व में तो कुछ हद तक ठीक है। अब जब जिला तहसील स्तर पर गुट बाजी चलने लगती है जैसे वह सांसद गुट का, वह विधायक गुट का, वह जिलाध्यक्ष गुट का, वह अध्यक्ष गुट का, वह इस जाति का वह फलां के गुट का। तब यह प्रश्न चिन्ह उपस्थित होता, आखिर पार्टी का संगठन कहा है कहा है पार्टी का ध्वज कहा गई पार्टी की एकता। आज पार्टी सार्वजनिक न होकर व्यक्तिगत होती जा रही है। आज देखने को प्राप्त हो रहा है जिसका जो दायरा है वह उस दायरे में न रहकर दूसरे के दायरे में हस्तक्षेप करता है उदाहरण के लिए सांसद के अपने दायरे है विधायक के अपने, जिलाध्यक्ष के अपने, अध्यक्ष के अपने हर व्यक्ति को अपने दायित्व का निर्वहन करना चाहिए। लोग करते भी है किंतु जब यह गुट बाजी का रूप ले लेता है तब विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न होती है। पार्टी के लोग ही पार्टी का गड्ढा खोदने लगते है। एक व्यक्ति अच्छा कार्य करता है तो उसकी नकारात्मक सोच के साथ गलत अर्थ निकालते है। गुटबाजी के चलते संगठन में गुट बाजी चाटुकारों को स्थान प्राप्त हो जाता है उसके कार्य का पूर्व अवलोकन न करके गुट चाटुकारिता को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है ऐसे में पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं जिन्होंने वर्षों से पार्टी के प्रति समर्पित होकर कार्य किया है उन्हें स्थान प्राप्त नहीं होता कारण वह सभी के साथ में है पार्टी के समर्पित है यदि वह गुट के होते गुट के साथ 24 घंटे इर्द गिर्द घूमते तो उनकी पहचान होती। आज गुट बाजी के कारण पद की गरिमा का विदोहन अवमूल्यन हो रहा है वाणी में संयम नहीं है। जिसने जिसको जिस लायक बनाया उसी के पंख काटने के लिए पीठ पीछे आतुर रहते है । पर्दे के पीछे निंदा कर अपने आप को सर्वश्रेष्ठ करने में माहिर होकर गुट को प्रमुखता स्थान प्रदान करता है।
रवींद्र सिंह मंजू सर मैहर की कलम कहती है कि भारत एक गुट निरपेक्ष राष्ट्र है विश्व दो गुटों में सोवियत संघ एवं अमेरिका गुट में बटा हुआ था। स्वतंत्रता के बाद पाकिस्तान अमेरिका गुट में चला गया जबकि भारत किसी भी गुट में नहीं गया तो आज भारत विकसित राष्ट्र की श्रेणी में अग्रसर है। हम सभी को भी किसी के गुट में न होकर अपनी धरा के विकास के साथ होना चाहिए जो हमारी धरा, पार्टी के एकता के सूत्र में बांधकर चले हम सभी एक है न कि अलग अलग गुट के। गुट बाजी करने से पार्टी के कार्यकर्ता के प्रति असमंजस एवं डरे हुए मन की परिकल्पना मन मस्तिष्क में केंद्र बिंदु पर स्थिर हो जाती है। एवं नियोक्ता के मन पर भी यह पारदुभाव हो जाता है कि यह व्यक्ति उस गुट का है और कार्य करने में अनदेखी कर देता है ।आज गुट बाजी इस तरह हो गई है कि वह उस गुट की सभा है वह उस व्यक्ति की सभा है जिससे हमारा विरोधाभास है आखिर यह सब क्या है। एक दूसरे की लोग टांग खींचने में लगे हुए है।
रवींद्र सिंह मंजू सर मैहर की कलम कहती है कि लोग आज परोपकार भी भूल गए है आज लोगो की पराकाष्ठा बनती जा रही है अपना काम बनता भाड़ में जाए जनता। पुराना किया गया त्याग समर्पण भूल कर नए चाटुकारिता इर्द गिर्द घूमना और गुट में सम्मिलित होकर अपना उल्लू सीधा करना मात्र रह गया है। चाहे वह किसी भी पार्टी में हो चुनाव आया नहीं की गुट बाजी हावी होने लगती है लोग एक दूसरे से कन्नी काटने लगते है और अपने पंख जमाने गुट के लोगो के साथ मिलकर करने लगते है। प्रश्न यह उपस्थित होता है कि आखिर कार्यकर्ता कहा जाय। इस गुट बाजी के कारण सबसे ज्यादा पार्टी को नुकसान होता है।
रवींद्र सिंह मंजू सर मैहर की कलम कहती है कि आज जाति पात भी गुट बाजी की भूमिका का निर्वहन करने में अपनी अहम भूमिका का निर्वहन करता है वह इस जाति का है,वह इस जाति का। आज नेताओं को भी जाति में बांट लेते है नेता तो छोड़िए प्रशासनिक अधिकारियों को भी अनावश्यक मन की परिकल्पना से जाति के कुचक्र में जकड़ने का प्रयास करते है और कुछ हद तक सफल भी हो जाते है। अर्थात आज के दैनिक परिवेश में जो “यहां वहां जहां तहा मत पूछो कहा कहा है गुट बाजी वहां वहां” का कथन चलाए मान है उसे दूर करना होगा।
रवींद्र सिंह (मंजू सर) मैहर की कलम कहती है कि हम सभी यदि अपनी धरा का सर्वांगीण विकास करना चाहते है तो सकारात्मक सोच के साथ इस गुटबाजी की प्रथा से कोषों दूर होना होगा। तभी हमारी धरा एकता के सूत्रपात में बधकर संगठन में बल है कि परिभाषा के साथ विकसित धरा की ओर अग्रसर हो सकेगा अन्यथा पतन निश्चित है। इसलिए गुटबाजी को त्यागना होगा ।
✍️ रवींद्र सिंह (मंजू सर)
आरपीकेपी इंडिया न्यूज
मैहर
