मित्र और शत्रु कौन…? — मैहर वाली शारदा माता धाम से एक अनमोल चिंतन
(मैहर) वर्तमान समय में एक महत्वपूर्ण और गहरी बात हमारे सामने आती है कि इस संसार में हमारा मित्र और शत्रु कौन है? जब तक हम अपने मित्र और शत्रु की पहचान नहीं करेंगे, तब तक हम सच्ची मित्रता के भाव को नहीं समझ पाएंगे और न ही शत्रुता के दुष्परिणामों से मुक्ति प्राप्त कर सकेंगे। इसलिए सबसे पहले यह पहचानना आवश्यक है कि इस संसार में हमारा मित्र कौन है और शत्रु कौन है?
रवींद्र सिंह मंजू सर मैहर की कलम से मित्र कौन है?वह व्यक्ति जो अपने माता-पिता एवं अपने मन पर विजय प्राप्त कर लेता है, उसके लिए सबसे अच्छा मित्र कोई और नहीं बल्कि उसका स्वयं का मन है। यही व्यक्ति का सबसे सच्चा मित्र होता है। जब व्यक्ति अपने भीतर के द्वंद्वों और इच्छाओं पर काबू पा लेता है, तो उसका मन ही उसे सच्ची शांति और संतोष प्रदान करता है।
रवींद्र सिंह मंजू सर मैहर की कलम से शत्रु कौन है? वह व्यक्ति जो संसार पर विजय प्राप्त कर चुका है, लेकिन अपने माता-पिता पर विजय प्राप्त नहीं कर पाया, उसके लिए उसका मन ही सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है। जब व्यक्ति अपने मन की इच्छाओं और भावनाओं से नियंत्रित होता है, तो वह अपने ही भीतर के शत्रु से जूझता है, जो उसे मानसिक अशांति और दुख की ओर ले जाता है।
निष्कर्ष: इस प्रकार, मित्र और शत्रु बाहर नहीं होते, वे हमारे भीतर होते हैं।हमारा मन ही हमारा सबसे बड़ा मित्र भी हो सकता है और सबसे बड़ा शत्रु भी। जो व्यक्ति इस सत्य को समझता है और अपने मन को नियंत्रित करता है, वह जीवन में सच्ची शांति और सफलता प्राप्त करता है।
अंत में रवींद्र सिंह (मंजू सर) कहते हैं कि, “ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ मित्रता और शत्रुता का ज्ञान भी व्यक्ति को अवश्य ही प्राप्त करना चाहिए। तभी उसका मन रूपी ज्ञान की पाठशाला में प्रवेश करना सार्थक होगा।”आप सभी को सादर नमन।मैहर वाली शारदा माता आप सभी पर अपना बौद्धिक रूप से आशीर्वाद बनाए रखें।यह चिंतन हमे अपने भीतर की पहचान करने और आत्मविजय सकारात्मक सोच बिना विरोधाभास की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
