“मशीन नहीं, इंसान हूँ मैं: पुरुष के मौन संघर्ष और अनकहे सम्मान का सत्य”
(मैहर) समाज में पुरुष को प्रायः शक्ति, साहस, धैर्य और जिम्मेदारी का प्रतीक माना जाता है। बचपन से ही उसे यह शिक्षा दी जाती है कि वह परिस्थितियों के सामने कभी कमजोर न पड़े, अपने आँसुओं को छिपाए रखे और हर चुनौती का दृढ़ता से सामना करे। यही कारण है कि वह धीरे-धीरे अपनी भावनाओं, इच्छाओं और व्यक्तिगत सपनों को पीछे छोड़कर परिवार, समाज और अपनों की अपेक्षाओं को पूरा करने में स्वयं को समर्पित कर देता है।जीवन के लंबे सफर में अनेक पुरुष ऐसे होते हैं जो अपने परिवार की खुशियों के लिए दिन-रात परिश्रम करते हैं। वे अपने माता-पिता, पत्नी, बच्चों और परिजनों की आवश्यकताओं को पूरा करने को अपना धर्म समझते हैं।
किंतु कई बार यह दुखद सत्य सामने आता है कि समाज और कुछ रिश्ते पुरुष के व्यक्तित्व का मूल्यांकन उसके मानवीय गुणों से अधिक उसकी उपयोगिता के आधार पर करने लगते हैं। जब तक वह सक्षम, सफल और संसाधनों से सम्पन्न रहता है, तब तक उसे सम्मान और महत्व मिलता है, लेकिन जैसे ही वह किसी आर्थिक, मानसिक या सामाजिक संकट से गुजरता है, अनेक लोग उससे दूरी बना लेते हैं।यही वह क्षण होता है जब पुरुष का अंतर्मन सबसे अधिक आहत होता है। वह बाहर से मजबूत दिखाई देता है, लेकिन उसके भीतर भी भावनाओं का एक अथाह सागर होता है।
रवींद्र सिंह( मंजू सर )मैहर की कलम कहती है कि उसे भी प्रेम चाहिए, अपनापन चाहिए, सम्मान चाहिए और ऐसा कोई चाहिए जो बिना किसी स्वार्थ के उसकी भावनाओं को समझ सके। दुर्भाग्यवश, समाज अक्सर पुरुष के आँसुओं को कमजोरी और उसकी संवेदनशीलता को दुर्बलता समझ लेता है। परिणामस्वरूप वह अपनी पीड़ा को स्वयं तक सीमित रखता है और मुस्कान के पीछे अपने अनेक घाव छिपा लेता है।
वास्तविक प्रेम और सच्चा रिश्ता वही होता है जो व्यक्ति की सफलता में ही नहीं, बल्कि उसके संघर्ष और असफलताओं में भी उसके साथ खड़ा रहे। प्रेम का अर्थ केवल सुख के दिनों में साथ निभाना नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी विश्वास, सम्मान और सहयोग बनाए रखना है। किसी व्यक्ति का महत्व उसकी संपत्ति, पद, प्रतिष्ठा या सामर्थ्य से नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व और उसके मानवीय गुणों से होना चाहिए।आज आवश्यकता इस बात की है कि हम पुरुषों को केवल जिम्मेदारियों का बोझ उठाने वाली मशीन न समझें, बल्कि एक संवेदनशील इंसान के रूप में स्वीकार करें।
जिस प्रकार स्त्रियों की भावनाओं का सम्मान आवश्यक है, उसी प्रकार पुरुषों की भावनाओं को भी समझना और महत्व देना उतना ही आवश्यक है। जब रिश्तों में स्वार्थ की जगह संवेदना, अपेक्षाओं की जगह सहयोग और उपयोगिता की जगह आत्मीयता आ जाएगी, तभी प्रेम और सम्मान का वास्तविक वातावरण निर्मित होगा।”प्रेम कभी खरीदा नहीं जाता, प्रेम तो वह अनमोल उपहार है जो किसी व्यक्ति को उसके होने मात्र के कारण दिया जाता है। जिस दिन समाज यह समझ जाएगा, उस दिन पुरुष की पीड़ाएँ कम हो जाएँगी और रिश्तों में सच्ची आत्मीयता का जन्म होगा।”
आप सभी को सादर नमन मैहर वाली शारदा माता सदा अपना आशीर्वाद बनाए रखे। जय हो मैहर वाली शारदा माता की।
✍️ रवींद्र सिंह (मंजू सर)
आरपीकेपी इंडिया न्यूज
मैहर
