अपेक्षाओं का चश्मा: “जब सब सही होते हुए भी गलत लगता है”….. रवींद्र सिंह (मंजू सर )
(मैहर) अक्सर जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जब सब कुछ व्यवस्थित रूप से चल रहा होता है, फिर भी हमें भीतर से असंतोष महसूस होता है। इसका कारण यह नहीं होता कि परिस्थितियाँ गलत हैं, बल्कि यह होता है कि वे हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हैं। जब हम अपने विचारों, इच्छाओं और योजनाओं को ही अंतिम सत्य मान लेते हैं, तब वास्तविकता हमें गलत प्रतीत होने लगती है।
रवींद्र सिंह( मंजू सर )मैहर की कलम कहती है कि मनुष्य स्वभाव से योजनाकार है। वह अपने मन में एक रूपरेखा बना लेता है कि कार्य कैसे होना चाहिए, लोग कैसे व्यवहार करें, और परिणाम कैसे आएँ। परंतु संसार केवल हमारे हिसाब से नहीं चलता। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी सोच, परिस्थितियाँ और प्राथमिकताएँ होती हैं। जब घटनाएँ हमारे बनाए ढाँचे से अलग दिशा में जाती हैं, तो हमें लगता है कि कुछ गलत हो रहा है, जबकि वस्तुतः वह केवल भिन्न हो रहा होता है।
रवींद्र सिंह मंजू सर मैहर की कलम एक सार्थक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लेखन करती है कि मान लीजिए किसी कार्यालय में एक प्रबंधक ने परियोजना को पूरा करने के लिए अपनी एक विशेष योजना बनाई। उसने सोचा कि टीम के सभी सदस्य उसी क्रम में कार्य करेंगे जैसा उसने तय किया है। परंतु टीम के कुछ सदस्य अपने अनुभव के आधार पर कार्य को अलग ढंग से करने लगे।परिणाम समय पर और गुणवत्तापूर्ण मिला, किंतु प्रक्रिया प्रबंधक की योजना से अलग थी। अब यदि प्रबंधक केवल इस कारण असंतुष्ट हो जाए कि कार्य उसकी पद्धति से नहीं हुआ, तो समस्या परिणाम में नहीं, उसकी अपेक्षा में है।
यह स्थिति परिवार में भी देखी जा सकती है। माता-पिता अक्सर सोचते हैं कि उनका बच्चा वही करियर चुने जो वे उचित समझते हैं। यदि बच्चा अपनी रुचि के अनुसार अलग क्षेत्र चुन ले और उसमें सफल भी हो जाए, तब भी माता-पिता को प्रारंभ में यह निर्णय गलत लग सकता है, क्योंकि वह उनकी कल्पना के अनुरूप नहीं था। समय के साथ जब वे समझते हैं कि सफलता का मार्ग एक नहीं, अनेक हो सकते हैं, तब उनकी दृष्टि बदलती है।
अपेक्षाएँ बनाम वास्तविकता
जब हम अपने विचारों को ही पूर्ण सत्य मान लेते हैं, तो हम अनजाने में दूसरों की स्वतंत्रता और परिस्थितियों की विविधता को अनदेखा कर देते हैं। जीवन एक बहती नदी की तरह है, जो हर मोड़ पर नया मार्ग चुन सकती है। यदि हम हर बार नदी को अपने नक्शे के अनुसार मोड़ना चाहें, तो निराशा ही हाथ लगेगी। वास्तविक परिपक्वता तब आती है जब हम यह स्वीकार करते हैं कि “सही” केवल हमारा दृष्टिकोण नहीं है। कई बार दूसरे का तरीका भी उतना ही उचित, बल्कि अधिक प्रभावी हो सकता है।
रवींद्र सिंह( मंजू सर) मैहर की कलम निष्कर्ष रूप से कहती है कि सब सही हो रहा है, पर गलत इसलिए लग रहा है क्योंकि वह आपके हिसाब से नहीं हो रहा” — यह चिंतन हमें आत्ममंथन की ओर प्रेरित करता है। यह सिखाता है कि समस्या हर बार परिस्थितियों में नहीं होती, कभी-कभी हमारे दृष्टिकोण में भी होती है। यदि हम अपेक्षाओं का चश्मा उतारकर खुले मन से देखना सीख लें, तो पाएँगे कि जीवन में बहुत कुछ सही चल रहा है—बस वह हमारे बनाए साँचे से थोड़ा अलग है।
