बरही में आधार सेवा केंद्रों पर ‘उगाही तंत्र’ का राज: रेट सूची गायब, बिना रसीद वसूली, गरीबों का खुला शोषण, प्रशासन मौन
(बरही) आम जनता को पहचान देने और सरकारी योजनाओं से जोड़ने के लिए स्थापित आधार सेवा केंद्र अब बरही में भ्रष्टाचार, अव्यवस्था और शोषण के केंद्र बनते जा रहे हैं। नए बस स्टैंड और तहसील कार्यालय परिसर में संचालित लोक सेवा केंद्रों के अंतर्गत चल रहे आधार सेंटरों की जमीनी हकीकत चौंकाने वाली है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक विफलता को उजागर करती है, बल्कि पूरे ई-गवर्नेंस सिस्टम की विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार भी करती है।
लगातार शिकायतें, मीडिया रिपोर्ट्स और बढ़ते जनआक्रोश के बावजूद जिम्मेदार विभागों की चुप्पी अब सामान्य लापरवाही नहीं, बल्कि संभावित मिलीभगत की ओर इशारा कर रही है। निरीक्षण के नाम पर केवल खानापूर्ति और उसके बाद फिर वही मनमानी—यह पूरा खेल अब खुलेआम संचालित हो रहा है।
रेट सूची गायब: जानकारी छिपाओ, पैसा बढ़ाओ का संगठित खेल
सबसे बड़ा और गंभीर तथ्य यह सामने आया है कि किसी भी आधार केंद्र के बाहर सरकारी निर्धारित शुल्क (रेट सूची) प्रदर्शित नहीं किया गया है। न किसी सेवा का शुल्क लिखा है, न ही आवश्यक दस्तावेजों की सूची उपलब्ध है।
यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति प्रतीत होती है—जहां जानकारी छिपाकर लोगों से मनमाने पैसे वसूले जा रहे हैं। जब नागरिकों को सही शुल्क का ज्ञान ही नहीं होगा, तो वे विरोध कैसे करेंगे?
निर्धारित शुल्क से कई गुना वसूली: बिना रसीद पैसा, खुला भ्रष्टाचार
स्थानीय लोगों का आरोप है कि फॉर्म भरने के नाम पर 10 से 20 रुपये अतिरिक्त वसूले जा रहे हैं, जिसका कोई वैधानिक आधार नहीं है। इतना ही नहीं, कई मामलों में 120 से 150 रुपये तक वसूली आम बात हो चुकी है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इस अतिरिक्त राशि की कोई रसीद नहीं दी जाती। यानी पूरा लेनदेन “ऑफ द रिकॉर्ड” है—सीधे जेब में, बिना किसी जवाबदेही के। यह स्थिति सीधे-सीधे भ्रष्टाचार की श्रेणी में आती है।
गरीब लाइन में, रसूखदार सीधे अंदर: व्यवस्था नहीं, ‘पहचान तंत्र’ हावी
आधार केंद्रों के बाहर रोजाना लंबी कतारें देखने को मिलती हैं। मजदूर, महिलाएं, बुजुर्ग और दूरदराज से आए लोग घंटों लाइन में खड़े रहते हैं। इसके विपरीत, प्रभावशाली और रसूखदार लोगों को बिना किसी प्रतीक्षा के सीधे अंदर प्रवेश मिल जाता है। यह दृश्य केवल अव्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता और भेदभाव का जीवंत प्रमाण है, जहां “पहचान” नियमों पर भारी पड़ रही है।
“सर्वर डाउन” का बहाना: तकनीक के नाम पर जनता को गुमराह
कई उपभोक्ताओं ने आरोप लगाया है कि “सर्वर डाउन” अब एक स्थायी बहाना बन चुका है। जब भी भीड़ अधिक होती है या काम टालना होता है, लोगों को यही कहकर वापस भेज दिया जाता है। दूर-दराज के गांवों से आने वाले लोग 2-3 दिन तक लगातार चक्कर काटते रहते हैं, लेकिन उनका काम नहीं हो पाता। यह सवाल खड़ा होता है—क्या यह वास्तव में तकनीकी समस्या है या फिर योजनाबद्ध तरीके से लोगों को परेशान किया जा रहा है?
मूलभूत सुविधाओं का अभाव: जमीन पर बैठने को मजबूर जनता
इन केंद्रों की हालत यह है कि वहां बैठने की समुचित व्यवस्था तक नहीं है। महिलाएं, बुजुर्ग और छोटे बच्चे जमीन पर बैठकर घंटों अपनी बारी का इंतजार करते हैं। पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। यह स्थिति दर्शाती है कि सरकारी सेवा केंद्रों में आम जनता के सम्मान और सुविधा की कोई प्राथमिकता नहीं है।
“पैसा दो, काम लो” मॉडल: सेवा नहीं, सौदेबाजी का सिस्टम
कई नागरिकों ने स्पष्ट आरोप लगाए हैं कि जो लोग अतिरिक्त पैसा देते हैं, उनका काम प्राथमिकता से कर दिया जाता है। वहीं अन्य लोगों को बार-बार “कल आना” कहकर टाल दिया जाता है। यह स्थिति दर्शाती है कि आधार सेवा अब अधिकार नहीं, बल्कि “भुगतान आधारित सुविधा” बन चुकी है।
डर और दबाव का माहौल: शिकायत करने से रोकी जा रही जनता
सबसे गंभीर आरोप यह है कि केंद्र संचालक लोगों को शिकायत दर्ज कराने से हतोत्साहित करते हैं। कुछ मामलों में अप्रत्यक्ष रूप से नुकसान की चेतावनी भी दी जाती है। यह केवल आर्थिक शोषण नहीं, बल्कि मानसिक दबाव के माध्यम से चलाया जा रहा एक संगठित तंत्र प्रतीत होता है।
सीएम हेल्पलाइन भी बेअसर: क्या शिकायत तंत्र भी निष्क्रिय?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि सीएम हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायतों का भी कोई ठोस परिणाम नहीं निकल रहा है। कई शिकायतें बिना गंभीर जांच के ही बंद कर दी जाती हैं। यदि शिकायत तंत्र ही निष्प्रभावी हो जाए, तो आम जनता न्याय के लिए कहां जाए?
मिलीभगत का संदेह: संरक्षण किसका?
क्षेत्र में यह चर्चा तेजी से फैल रही है कि इन केंद्रों को कुछ प्रभावशाली लोगों और विभागीय अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त है। यदि यह सत्य है, तो यह मामला केवल स्थानीय स्तर का भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क का संकेत है, जिसकी निष्पक्ष जांच अत्यंत आवश्यक है।
जनता के तीखे सवाल
क्या सरकारी सेवा पाने के लिए रिश्वत देना अनिवार्य हो गया है?
क्या गरीब और सामान्य नागरिकों के लिए सिस्टम में कोई जगह नहीं बची?
क्या शिकायत करना अब सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया है?
जनता की स्पष्ट मांग:
अब कार्रवाई चाहिए, आश्वासन नहीं सभी आधार केंद्रों पर तत्काल रेट सूची और दस्तावेज सूची अनिवार्य रूप से चस्पा की जाए
अवैध वसूली पर तत्काल रोक लगाकर दोषियों पर कार्रवाई हो केंद्रों पर सीसीटीवी निगरानी और पारदर्शी टोकन सिस्टम लागू किया जाए
स्वतंत्र एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जाए
शिकायतों का समयबद्ध और निष्पक्ष निपटारा सुनिश्चित किया जाए केवल भ्रष्टाचार नहीं, सिस्टम की विफलता का प्रतीक
बरही के आधार सेवा केंद्रों की वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि यहां केवल नियमों का उल्लंघन नहीं हो रहा, बल्कि पूरे सिस्टम को दरकिनार कर एक समानांतर “मनमानी तंत्र” संचालित हो रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है
क्या प्रशासन इस संगठित उगाही तंत्र को समाप्त करेगा, या फिर आम जनता यूं ही शोषण का शिकार होती रहेगी?
