‼️विचारणीय चिंतन‼️ आज अनपढ़ पत्रकार बन गए हैं, अपराधी भी ‘प्रेस’ लिख रहे हैं, कैसे बचेगी पत्रकारिता ?

(भोपाल) आज अधिकांशतः हम सभी को देखने को मिल रहा है की 5 वी, 8 वी पास या इससे भी कम वाले पत्रकार बहुतायत में मिल जायेंगे। पत्रकार क्या होता है ?उसकी क्या परिभाषा है ?उसके क्या दायित्व है? उसे लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ क्यो कहा जाता है? तमाम इस प्रकार के प्रश्न है जिससे लोग अनभिज्ञ है।

आज ग्लैमर की चाह और पुलिस-प्रशासन के बीच सम्बन्ध गांठने के लिए जहां पहले… अपराधियों का पत्रकारिता की ओर रुख समाज के लिए खतरा बनता जा रहा है। क्या ग्लैमर की चाह और पुलिस-प्रशासन के बीच सम्बन्ध गांठने के लिए जहां पहले अपराधी किसी राजनीतिक हस्ती या पार्टी का दामन थाम लेते थे, वहीं वर्तमान में ये ट्रेंड बदल गया है। आज देखने को मिल रहा है अपराधी प्रवृत्ति के लोग अब पत्रकारिता की तरफ रुख कर रहे हैं। कितने तो इसकी आड़ में गलत कृत्य रूपी कार्य करने में आतुर है।

मेरी कलम कहती है कि जब चपरासी से लेकर सभी सम्मान पदों के लिए डिग्री योग्यता होना निश्चित है। किंतु पत्रकार बनने के लिए कोई योग्यता नही यह एक प्रश्न चिन्ह उपस्थित होता है आखिर क्यो नही। आज कुछ लोग पत्रकारिता वर्तमान में अपराधियों का सबसे पसंदीदा क्षेत्र बनता जा रहा है।इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मिडिया के साथ वेब, पोर्टल और सोशल मीडिया, व्हाटसप पत्रकार भी देखने को मिल रहे है आदि जैसे दूसरे साधन आ जाने के बाद कोई भी शख्स कभी भी खुद को छायाकार या पत्रकार खुद ही घोषित कर दे रहा है।

दुखद पहलू ये है कि जिस पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, उसमें कभी बुद्धिजीवी और समाज के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा लिए लोग आते थे, जबकि आज अंधाधुंध अखबारों, पत्रिकाओं, वेब पोर्टल्स , तमाम पत्रकार संगठन के आ जाने के बाद बड़ी संख्या में अपराधियों को भी ‘प्रेस’ लिखने का सुनहरा मौका मिल गया है। इसके सहारे वो न सिर्फ़ अपने पुराने अपराधों को छुपाए हुए हैं, बल्कि नये अपराधों को भी जन्म देकर, पुलिस और प्रशासन पर अपनी पकड़ भी मजबूत कर रहे हैं। वे तमाम तरह के गैरकानूनी कार्य पत्रकारिता की आड़ में संचालित करने में लगे हैं।एक व्यावहारिक गणना और साक्ष्यों के मुताबिक़ कक्षा 5वीं या 8वीं और कई मामलों में तो अशिक्षित भी, खुद को मीडियाकर्मी बताते घूम रहे हैं। इनकी गाड़ियों मे बड़े बड़े शब्दो से प्रेस मीडिया लिखा मिलेगा।इनकी संख्या भी सैकड़ों में मिल जायेगी।

मेरी कलम कहती है की अब बड़ा सवाल ये है कि वास्तविक पत्रकारों की मर्यादा और पत्रकारिता जैसी महत्वपूर्ण विधा को अपराध और अपराधियों के चंगुल से कैसे बचाया जाए? और आखिर बचायेगा तो कौन? क्या पत्रकारिता के प्रणेता गणेश शकर विधार्थी, का आज औचित्य बचा है कृपया विचार कीजिये। आज असली साहित्य के जानकार कलम कार का मूल्य कम होता जा रहा है।आज पत्रकारिता अर्थ के इर्द गिर्द गुट बाजी के साथ स्वार्थ रूप से जकड़न के जाल मे ग्रसित हो रही है।

मेरी कलम कहती है की वह यह भूल जाते है की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ है।अर्थात जनता द्वारा जनता के लिए हितार्थ रूप से किया गया कार्य लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ में प्रकट हो सकता है। जिस प्रकार न्याय पालिका, कार्य पालिका, व्यस्थापिका के दायित्व होते है उसी प्रकार हम कलम कारों के भी दायित्व होते है।किसी भी कार्य को जीवन में करने से पहले अपनी आत्मा से स्व आकलन कर मूल्यांकन करना चाहिए की आखिर हम पत्रकारिता क्यो कर रहे है।
“कृपया विचार अवश्य करे”

✍️ *रवींद्र सिंह (मंजू सर), मैहर
जिलाध्यक्ष, राष्ट्रीय अधिमान्य पत्रकार संगठन मैहर

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