“विश्वास” एक संवेदनशील मनोभाव है – पंडित सुरेन्द्र दुबे

(विजयराघवगढ़) “विश्वास” एक संवेदनशील मनोभाव है जो मानव संबंधो की पवित्र भावनाओं पर आधारित रहता है। यह चारित्रिक दृढ़ता को परखने के बाद अंतर्मन में धीरे-धीरे उत्पन्न होता है। आंतरिक प्रेम एवं सौहार्द से पल्लवित और पुष्पित होकर अंतस में फिर इन्हीं भावों को जन्म देता है। इससे मानवीय संबंध और अधिक प्रगाढ़ होते हैं।

विश्वास पारिवारिक और सामाजिक रिश्वतों कि बुनियाद है तथा इनके स्थायित्व के लिए संजीवनी काम करता है।विश्वासजन्य आत्मीयता के संबंध प्राणियों को आत्मीयता के बंधन में बांध लेते हैं, किंतु इसकी डोर इतनी नाजुक होती है कि टूटने में देर नहीं लगती। स्वार्थ इसका प्रमुख कारण है। इसका लेशमात्र भी विश्वास को एक पल के लिए टिकने नहीं देता। जब यह टूटता है तो हृदय पर चोट पड़ती है। फिर प्रगाढ़ से प्रगाढ़ संबंध भी चकनाचूर हो जाते हैं जिसका प्रतिकूल प्रभाव जगत जीवन पर पड़ता है, क्योकि इनका अस्तित्व विश्वास पर टिका है। अत: इनके कल्याण के लिए विश्वास को बनाए रखना प्रत्येक समाज का कर्तव्य है।उनकी ‘परवाह’ मत कीजिये, जिनका ‘विश्वास’ “वक्त” के साथ बदल जाया करता है।

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