ठाणे सेंट्रल जेल में क्षमता से तीन गुना कैदी, खराब भोजन और बदहाल व्यवस्था पर उठे सवाल

ऐतिहासिक विरासत और जेल पर्यटन की चर्चा के बीच कैदियों की मूलभूत सुविधाओं की स्थिति चिंताजनक

मुंबई/ठाणे। ऐतिहासिक महत्व रखने वाली ठाणे सेंट्रल जेल एक बार फिर सुर्खियों में है। एक ओर जहां इस ऐतिहासिक जेल को किले के रूप में पुनर्स्थापित कर पर्यटन स्थल बनाने की योजना पर चर्चा हो रही है, वहीं दूसरी ओर जेल के भीतर कैदियों की दयनीय स्थिति और मूलभूत सुविधाओं की भारी कमी गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

जानकारी के अनुसार ठाणे सेंट्रल जेल की क्षमता लगभग 1,100 कैदियों की है, लेकिन वर्तमान में यहां करीब 3,200 कैदी बंद हैं। क्षमता से लगभग तीन गुना अधिक कैदियों के रहने के कारण जेल प्रशासन पर भारी दबाव है। कैदियों को ठूंस-ठूंस कर सुलाया जा रहा है और कई कैदियों को पर्याप्त जगह तक नहीं मिल पा रही है।

जेल में कैदियों को दिए जा रहे भोजन की गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर शिकायतें सामने आई हैं। आरोप है कि कैदियों को परोसी जा रही दूध, चाय, दाल, सब्जी और रोटियां खराब गुणवत्ता की हैं। भोजन वितरण का समय भी अव्यवस्थित बताया जा रहा है। सुबह करीब 10 बजे और शाम 4 बजे भोजन दिए जाने से कैदियों को लंबे समय तक भूखे रहना पड़ता है।

कैदियों की संख्या अधिक होने के कारण जेल कर्मचारियों के लिए सभी पर निगरानी रखना भी चुनौती बन गया है। सामाजिक संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने जेल में भोजन और व्यवस्थाओं की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। मुख्यमंत्री और गृह मंत्री से मामले का तत्काल संज्ञान लेने की अपील भी की गई है।

इसी बीच ठाणे केंद्रीय जेल को लेकर एक नई बहस भी छिड़ गई है। यह जेल मूल रूप से पुर्तगालियों द्वारा वर्ष 1730 में ठाणे किले (क्विला) के रूप में बनाई गई थी। 1738 में मराठों ने इस पर विजय प्राप्त की, लेकिन बाद में 1744 में अंग्रेजों ने इस पर कब्जा कर लिया। अंग्रेजों ने वर्ष 1838 में इसे जेल में परिवर्तित कर दिया, जिसे आगे चलकर ठाणे सेंट्रल जेल के नाम से जाना गया।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई क्रांतिकारियों को यहां रखा गया था। कृष्णजी कर्वे और विनायक नारायण देशपांडे जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को इसी जेल में फांसी दी गई थी।

ठाणे नगर निगम द्वारा जेल को अन्य स्थान पर स्थानांतरित कर इस ऐतिहासिक इमारत को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव सामने आया है। इसके लिए लगभग 1 करोड़ रुपये का बजट भी निर्धारित किया गया है। प्रशासन पहले भी जेल पर्यटन की प्रायोगिक योजना के तहत पर्यटकों को एक रात जेल में बिताने की अवधारणा पर काम कर चुका है।

पुरातत्वविद सुधाकर आप्टे का कहना है कि यह किला मराठा गौरव और इतिहास का प्रतीक है। उनके अनुसार इसे विरासत का दर्जा देकर संरक्षित किया जाना चाहिए। वहीं इतिहासकार गौरव गुप्ता ने चेतावनी दी है कि इमारत की स्थिति काफी जर्जर हो चुकी है और पर्याप्त बजट के बिना इसका संरक्षण मुश्किल होगा।

फिलहाल ठाणे सेंट्रल जेल अपनी ऐतिहासिक विरासत, जेल पर्यटन की चर्चाओं और कैदियों की बदहाल स्थिति को लेकर बहस के केंद्र में बनी हुई है।

✍️ संजीव भागीरथी पांडे
           महाराष्ट्र प्रमुख
RPKP INDIA NEWS

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