यात्रा … महाकुंभ तीर्थयात्रा…..एक आकलन….! रवींद्र सिंह (मंजू सर) मैहर की कलम से
(मैहर) आज बिना लाग लपेट के बहुत सटीक शब्दों में अपनी बात रखने जा रहा हूं। इस पर विरोध जम कर होने वाला है। पर जो हो सो हो अच्छा लगे चाहे बुरा। बहुत से लोग महा कुम्भ के विषय मे अनुभव लिख रहे जिन्हें तकलीफ हुई उनसे भी मैं सहमत नही जिन्हें नही हुई उनसे भी मैं सहमत नही। बहुत पैदल चलना पड़ा छाले पड़ गए, बच्चे साथ थे, बुजुर्ग साथ थे परेशान हुए।
रवींद्र सिंह मंजू सर मैहर की कलम कहती है कि तीर्थ जाते हो भाई शादी व्याह में नही। तीर्थ का मतलब ही होता है परीक्षा, त्याग और ईश्वर से साक्षात्कार।शिव कैलाश पर ही मिलेंगे न? कि 5 स्टार 7 स्टार होटल में? कमरा अच्छा नही मिला रुकने की व्यवस्था नही हुई,भोजन अच्छा नही मिला। क्या पाने गए थे उधर? लक्ज़री? या सब मोह माया छोड़ ईश्वर को अनुभव करने गए थे? यात्रा का अर्थ ही होता है “कष्ट” तीर्थयात्रा का अर्थ ही होता है अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलकर मोह माया से डिटैचमेंट। पहले लोग जब यात्रा पर जाते थे तो बहुत बड़ी बात होती थी कि साहब यात्रा पर जा रहे और जब लौटते थे तो भव्य स्वागत होता था की सकुशल लौट गए।
रवींद्र सिंह मंजू सर मैहर की कलम कहती है कि यात्रा का अर्थ ही होता है सुदामा का श्री कृष्ण से मिलन।
“न सर पे है पगड़ी न तन पे है जामा बता दो कन्हैया से नाम है सुदामा”
जानते है इस भजन का अर्थ क्या हुआ? कि कृष्ण से कह दो मैं अहंकार, सुख, परिवार सब छोड़कर तुझसे मिलने आया हूँ। ये होता है अध्यात्म से साक्षात्कार और आध्यात्मिक यात्रा।
रवींद्र सिंह मंजू सर मैहर की कलम कहती है कि जो आप लोग करने जाते हो न भर भर कर कपड़े ले जाना, पेट भर भोजन की ,स्वादिष्ट भोजन कि लालसा करना, आरामदायक बिछौने की आशा करना ये सब ही माया है और इसे ट्रिप कहते है। “घूमना” घूमने जाना और यात्रा पर जाना दोनों अलग बाते हैं। अरे! कैसी बातें करती हो वर्षा, स्नान अलग होता है वहां डुबकी सब लगाने जाते फिर न जाने कब आएगा। अच्छा? क्या होगा डुबकी लगाने से? पाप धुल जाएंगे? पहले ओर पाप नही करोगे ये मन बना लो तब पुराने धोना।
एक माताजी की रील वाइरल हो रही जो घर से बिना बताए केवल पोती के संज्ञान में डालकर की मैं स्नान करने जा रही हूं निकल गयी चुपचाप। हर कुम्भ में जाती है ऐसे ही। 70- 80 के आसपास रही होंगी। खाओगी कहाँ, रहोगी कहाँ पूछने पर बताती है खुशी से झूम कर कही भी बहुत जगह है, सब व्यवस्था हो जाती है ऊपर वाला साथ है। पत्रकारों ने कहा घर बात करवा देते है कर लो। कहती नही यात्रा पर आई हूं। अभी भटकना नही है। आनंद ले रही हूं स्नान का। भगदड़ का पूछने पर बताती है हाँ पहले भी देखी थी। कोई पुल टूटा तब भी थी। चलता है ईश्वर की ही लीला है। जिसको ले जाना है साथ ले जाएंगे। हमारा टाइम नही आया था भाग्य में और ये कुंभ देखना था सो जिंदा है। मतलब इतनी पाजिटिविटी, सलूट रहेगा अम्मा को। इसे कहते है आस्था, विश्वास और यात्रा। रशियन लोगों का एक जत्था लोडिंग टेम्पो में घूम रहा, पहना क्या है? भगवा। जितने भी विदेशी आ रहे अधिकतर भगवा धारण किये हैं, किनारे बैठ के पत्तल में खा रहे, मस्त मलंग घूम रहे हैं। जानते है करोड़पति अरबपति लोग है, सात समंदर पार अपना हर सुख छोड़कर आये है आध्यात्मिक सुख लेने। हम सनातन में पैदा होकर सनातन को नही समझ पा रहे।
रवींद्र सिंह मंजू सर मैहर की कलम कहती है कि यदि वाकई ईश्वर को पाना है। तो “चंचल मन” को घर रखकर जाओ, “मोह” को घर रखकर जाओ औऱ “माया” को भी घर छोडकर जाओ वरना डर के साये में क्या ही ईश्वर मिलेगा और शिकायत करके तो ईश्वर के पास जाकर भी खाली हाथ लौट आओगे।
