“सुख” तभी अच्छा लगता है, जब मन में “शान्ति” हो … पंडित सुरेन्द्र दुबे
(विजयराघवगढ़) मानव मन जीवन पर्यंत सुख की खोज में जुटा रहता है। यदि हम अपने जीवन चक्र के समस्त कार्य कलापों का सूक्ष्मता से निरीक्षण करें तो निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि हमने अबतक जो कुछ भी किया वह केवल सुख की लालसा के लिए ही किया।
वास्तव में सुख और आनन्द में अंतर ही हम सुख की प्राप्ति को ही आनन्द की अनुभूति मान बैठते हैं जबकि यह यर्थाथ नहीं है। सुख यदि मिल जाये तो निश्चित नहीं कि यह सदा के लिए हो।उसकी समाप्ति के बाद फिर हम दूसरों को या अपने भाग्य को दोषी ठहराने लग जाते हैं।यह सिलसिला निरंतर चलता रहता है।
हमें आभास होता है कि बहुत धनाढ्य व्यक्ति खूब सुखी होगा,सदैव आनंदित रहता होगा ! यह सच नहीं है,न ही ऐसा मानना एक मध्यवर्गीय सोच का परिणाम है- जो बहुधा कहा जाता है, इसमें कोई दो मत नहीं कि जो कुछ हमें चाहिए उसे पा लेने में सुख की अनुभूति होना स्वाभाविक है,लेकिन साथ-साथ एक डर अवश्य जुड़ा रहता है कि मेरी भौतिक वस्तु न जाने किस दिन खो जाये।
‘सुख’ तभी अच्छा लगता है, जब मन में ‘शान्ति’ हो,
क्योंकि .., सुख चाहे जितना हो, परन्तु शान्ति न हो तो सुख बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता है। इसलिए जीवन में शान्ति हो तभी सुख ‘सुन्दर’ लगेगा, नहीं तो सभी सुख ‘संताप’ जैसे लगेंगे।

